आवश्यक सूचना…ब्लॉगर पर वापसी!!

अगस्त 6, 2007 को 10:18 अपराह्न पर | Posted in Uncategorized | 5s टिप्पणियाँ

मैँ पुनः ब्लॉगर.कॉम पर वापस चला गया हूँ…आगे से वहीँ मुलाक़ात होगी! पता है: http://antarman.blogspot.com . मेरे चिट्ठा-लेखन की शुरुआत इसी चिट्ठे से हुई थी….पिछले वर्ष वर्ड्प्रेस पर वापस आया…और अब ब्लॉगर पर वापस जा रहा हूँ।

हिन्दी एक क्षेत्रीय भाषा?

जुलाई 29, 2007 को 12:57 पूर्वाह्न पर | Posted in Uncategorized | 2s टिप्पणियाँ

http://in.msn.com के अनुसार हिन्दी एक ’क्षेत्रीय भाषा’ है।

मेरी पसंदीदा हिन्दी हास्य-फ़िल्में

मई 6, 2007 को 12:44 पूर्वाह्न पर | Posted in चल-चित्र, सूची | 9s टिप्पणियाँ

तो ये लीजिये ये रहीं मेरी कुछ पसंदीदा हिंदी हास्य -फ़िल्में। आशा है आप भी अपनी कुछ पसंदीदा हास्य फ़िल्मों के बारे में बताएंगे।

१. जाने भी दो यारों

२. हंगामा

३. राजा बाबू

४. हेरा-फेरी

५. गोलमाल

६. खोसला का घोसला

७. अंगूर

८. छोटी सी बात

ग़ज़ल

अप्रैल 12, 2007 को 12:51 पूर्वाह्न पर | Posted in ग़ज़ल | 11s टिप्पणियाँ

हम खड़े तकते रहे इन आशियानों पर क़हर

ख्वाब सारे जल गए पर ना पड़ी उसकी नज़र

दूसरों के दर्द को भी देख आंखें न हों नम

ऐ ख़ुदा नाचीज़ को इस तू न दे ऐसा हुनर

निगल जाए जो कि खुद ही हर किनारे को

इस समंदर में हमें ना चाहिये ऐसी लहर

पहुंच कर मंज़िल पे धोख़ा दे दिया रहबर ने यूं

‘ज़श्न’ लुटता क़ारवां और सो रहा सारा शहर

पारसी एवं हिन्दू धरम – जतीन्द्र मोहन की पुस्तक

अप्रैल 9, 2007 को 10:09 अपराह्न पर | Posted in Uncategorized | 1 टिप्पणी

जतीन्द्र मोहन चटर्जी की इस पुस्तक (http://www.avesta.org/chatterj_opf_files/slideshow.htm)  को पढ़ कर देखिये। इसके प्रिफ़ेस में काफ़ी रोचक जानकारी है – बाकी पुस्तक में पारसियों की धर्म-पुस्तक ’गाथा’ का अनुवाद किया गया है।

चटर्जी साहब के अनुसार :

१. वेदों में वर्णित ’वरुण’ जो कि असुरों के देव हैं,  पारस ’सुर’ शब्द भारत के वासियों के लिये प्रयुक्त होता था। सुर के देव ’इन्द्र’ थे…जो कि  वरुण के मित्र थे। (वरुण-इन्द्र की एक साथ उपासना होती थी)। इन्द्र देव पारसी धर्म में ’मित्र’ के रूप में जाने जाते थे। ’असुर’शब्दशुरुआत में एक आदरणीय शब्द था जो कालांतर में ’दानव’ के लिये प्र्युक्त होने लगा।

२. ’अहुरा माज़्दा’ जो कि पारसीयों के ईश्वर हैं – वेदों में ’हरि मेधा’ के नाम से जाने जाते हैं।

३. वेदों में     वर्णित परशुुराम सम्भवतः पारसी महारथी थे।

४. पारसी (असुर) मूर्ति-पूज के विरुद्ध थे एवम ’सुर’ मूर्ति-पूजक थे।  देवासुर संग्राम ् इन्ही दोनों के बीच का ्युद्ध है।

इसके अलावा इस पुस्तक में अन्य बहुत सी बातें लिखी हैं। आप ही अपने विचार बताएं।

हमारा इतिहास: भाषाएँ/लिपियों में समानताएँ

अप्रैल 7, 2007 को 3:22 पूर्वाह्न पर | Posted in Uncategorized | 6s टिप्पणियाँ

भाषा-लिपियों में मुझे बचपन से दिलचस्पी है। बचपन में मैंने थोड़ी बहुत बंगाली, तमिल, गुरमुखी, उड़िया, उर्दू (फ़ारसी) इत्यादि लिपियां सीखी थीं।

कुछ दिनों पूर्व अन्तरजाल पर पुरातन लिपियों के बारे में पढते हुए कुछ रोचक जानकारियां सामने आईं। यह विचार सामने आया कि क्या हमारे वैदिक/संस्कृत काल के महापुरुषों का फ़ारसी/ग्रीको-रोमन लोगों से कुछ लेना देना है? मायने यह कि लगता है कि हमारे पूर्वज कहीं इन देशों से तो नहीं थे, या कहीं इन देशों के ऐतिहासिक पुरुष भारत से तो नहीं थे? कुछ बेतरतीब विचार प्रस्तुत हैं,  फ़ुरसत मिलने पर इन्हें संयोजित करूंगा। अधिकतर जानकारी www.ancientscripts.com से साभार।

१. “ओल्ड पर्सियन”  में राजा के लिये ‘क्षत्रिय’ से मिलता जुलता एक शब्द प्रयुक्त होता था।

२. “भूमि” के लिये भी “भूमि” ,  भगवान के लिये “बग”, देश के लिये “दह्यौस” शब्द काफ़ी समान हैं। अन्य समानताएँ: http://en.wikipedia.org/wiki/Proto-Indo-Iranian

३. ‘कुरु’ कहीं ‘साइरस’ तो नहीं था (ओल्ड पर्सियन में Kūruš) (http://en.wikipedia.org/wiki/Kuru_%28kingdom%29)

४.  ‘अवेस्तन’ भाषा से संस्कृत की इतनी समानता क्यों? (http://en.wikipedia.org/wiki/Template:Iranian_Languages, लिपियों में समानता: देखें ‘अ’ ,’आ’, ‘इ’, ‘ओ’ , ट, ठ, ढ, म  http://www.ancientscripts.com/avestan.html)। यहाँ अन्तिम पैरा पढ़ें”

The ə symbol represents the mid central vowel (schwa) like the “e”s in “taken”.

    təm amavantəm yazatəm
    tam amavantam yajatam
     
    surəm damohu scvistəm
    suram dhamasu savistham
     
    miθrəm yazai zaoθrabyo
    mitram yajai hotrabhyah

५.  ओल्ड पर्सियन और देवनागरी वर्णमाला में काफ़ी समानताएं हैं। (http://www.ancientscripts.com/oldpersian.html)

६. देखें: http://www.avesta.org/chatterj_opf_files/slideshow.htm

७. कोरियन एवं देवनागरी में समानता: http://www.ancientscripts.com/korean.html. देखे: ट, र, म, प

८. ब्राह्मी लिपि एवन खरोष्ठी लिपि के काफ़ी अक्षर मध्य-पूर्वी लिपियों से मिलते हैं।

९. और तो और…कुछ जापानी अक्षर भी देवनागरी से मिलते-जुलते हैं।

आप इस बारे में अपने विचार भी मुझे बताएं। मैं आगे भी इस विषय पर जानकारी देता रहूंगा।

होली कविता

मार्च 6, 2007 को 8:19 अपराह्न पर | Posted in Uncategorized | 8s टिप्पणियाँ

[यह कविता कुछ दिनों पहले लिखी थी, पर समयाभाव की वजह से पोस्ट नहीं कर पाया। शायद आपको पसंद आए।] 

हो मंगलमय सबकी होली।

जिसने-जिसने पहने थे
भीगे उसके लहँगा-चोली।

जीजाजी रँग हैं लगा रहे,
साली उनकी कितनी भोली।

सब नाच रहे भँगडा-पा कर
रँग लाई भंग की इक गोली।

लेकर पिचकारी-गुब्बारे,
निकली होलिहारों की टोली।

पान बनारस का खाके,
ठंडाई मेँ मिसरी घोली ।

गम अपने-अपने भूले जब,
मिल गए गले सब हमजोली ।

घुल गये होली के  रंगों में,
सब छाप-तिलक-चन्दन-रोली।

कोई कैसे चुपचाप रहे,
कोलाहल की तूती बोली

सुमधुर स्वर दसों-दिशाओं  में,
बागोँ मेँ कोयल है डोली।

शरमाए-से सूरज ने भी
किरणों की गठरी खोली।

हो मंगलमय सबकी होली।

-’अन्तर्मन’

चिट्ठे जो लिखे नहीं गए…

मार्च 1, 2007 को 12:45 पूर्वाह्न पर | Posted in Uncategorized | 10s टिप्पणियाँ

(बुरा न मानो…:-)

(नोट: उपर्युक्त वाक्य फ़िर से पढ़ें )

हमें इन चिट्ठों का इन्तज़ार है…और रहेगा!

फ़ुरसतिया: गागर में सागर

जीतू: संज़ीदा लेखन के नए आयाम

अतुल: अविरत चिट्ठा लेखन के १०१ फ़ायदे

ईस्वामी: अन्कंट्रोवर्शियल ब्लॉग लेखन कैसे संभव

रवि रतलामी:  अव्यावसायिक चिट्ठा लेखन की समसामयिकता

समीर भाई:  गिरते बालों को फ़िरसे कैसे उगाएँ

आशीष:  कन्याओं से मित्रता  बढ़ाने के गुर

(होली की बधाइयाँ…)

होली के मौसम में मेरा चिट्ठा भी चोरी (?)

फ़रवरी 27, 2007 को 12:43 पूर्वाह्न पर | Posted in मौज़-मस्ती, समसामयिक | 10s टिप्पणियाँ

होली-पूर्व की ठिठोली का आगाज़ करते हुए हम नवोदित चिट्ठाकारा लावण्या जी से अनुरोध करते हैं कि इस समस्या का हल बताएँ! उन्होंने अपने चिट्ठे का नाम भी ‘अंतर्मन’ रखा है…जिससे कुछ समस्याएं पैदा हो सकती है, जैसे कि कोई मेरे चिट्ठे पर अपना गुस्सा उतारने के बजाए उनके चिट्ठे पर उतार सकता है…या उनकी चिट्ठी की तारीफ़ मेरे चिट्ठे में कर सकता है। वगैरह-वगैरह। बात सीरियस टाइप की है ;-)

आप सब से गुज़ारिश है कि इस बार होली पर मस्त-मस्त लेख-कविताएँ लिख मारें। अरे इससे अच्छा मौज़-मस्ती का मौक़ा कहां मिलेगा। और साल भर जिसके बारे में जो भी कहना हो- कह डालो….क्योंकि – बुरा न मानो…..होली है!

चिट्ठाकारों का होली-मिलन इस साल कहाँ आयोजित हो रहा है?

आप सबको होली-सप्ताह की शुभकामनाएं, खासकर हमारी चिट्ठा-भाभियों को! अरे गुझिया-पापड़ वगैरह तैयार किये कि नहीं? रंग और गुलाल की दूकान इधर है -

holi-colours1.jpg

अमेरिकन आइडल २००७ – एक भारतीय मूल का युवक?

फ़रवरी 20, 2007 को 10:39 अपराह्न पर | Posted in Uncategorized | 6s टिप्पणियाँ

आज के अमेरिकन आइडल (चैनल फ़ाक्स ५ : ८-१०) में एक १७ वर्षीय भारतीय मूल का  युवक – संजय भी मैदान में है…मेरे हिसाब से अमेरिकन आइडल में इतनी दूर तक पहुंचने वाला यह पहला भारतीय मूल का युवक है। आशा है सारे भारतीय इस्को वोट देंगे – आज उसने कुछ खास नहीं गाया, पर यदि आप आज (२० फ़रवरी) १० बजे से ११ बजे ई एस टी में उसे वोट कर सकें तो अच्छा होगा। वोटिंग का नम्बर है: १-८६६-IDOLS-०८.

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