आश्चर्य ..इतनी हिन्दी अन्तरजाल पर!
July 18, 2005 at 12:20 am | In Uncategorized | 8 Commentsएक हिन्दी के याहू समूह में अभिव्यक्ति की कडी मिली। अतुल अरोरा जी का कालजयी उपन्यास सामने ही था। वहां से अन्य कडियों पर गया। उसी से प्रेरणा पाकर यह चिट्ठा शुरू किया है। हिन्दी है कि बरसों बाद ही सही, मन से फूट पडी है। चलो देर आयद दुरुस्त आयद।
१९९८ में मैं अपनी पत्नी से इंटरनेट पर मिला था रेडिफ वार्ता कक्ष में। इतनी सारी coincidences एक साथ। इसका तो एक उपन्यास बन सकता है।
खुद को मैं ३० मार खां समझता था हिंदी में। अतुल वगैरह को देखकर धरातल पर आ गया।
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