संभव है क्या?
August 22, 2005 at 11:12 pm | In Uncategorized | 1 Commentमैने यहाँ एक कविता की पहली कुछ पंक्तियाँ दी है…इसे आगे बढ़ाने का प्रयास कीजिये-
इस एकाकी जीवन के तुम,
उल्लास बनो- संभव है क्या?
पतझड़ में सूखा बिरवा मैं,
मधुमास बनो- संभव है क्या?
मैं उड़ना चाहूं, तुम मेरे,
आकाश बनो- संभव है क्या?
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पहचान
August 20, 2005 at 9:52 pm | In Uncategorized | No Commentsअभी अभी एक मूवी देख कर आया। कॉमेडी थी
। बहुत दिनों बाद कोई मूवी देखी जिसमें लोग ठहाके लगा लगा के हंस रहे थे। मुझे आश्चर्य हुआ भारत पाकिस्तानी पात्रों को देखकर ..भले ही वे कुछ क्षणों के लिये चित्र-पटल पर उभरे थे..वो भी मज़ाकिया अन्दाज़ में। ऐसा लग रहा है कि भारतीयों को अब अमेरिका में कुछ पहचान मिलने लगी है। 5 साल पहले मैने गिनेस बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड देखी थी बार्नस ऐंड नोबल्स में ..जिसमें बालिवुड सितारों के बारे में एक पूरा सेक्शन था- माधुरी, शाहरुख के बडे बडे चित्रों के साथ! और हाँ यह कोई स्पेशल एडीशन नहीं था। मैनें तुरंत एक प्रति खरीदी, और भारत ले जा कर लोगों को दिखाया।
यहां मेरे निवास स्थल के पास एक मूवी थियेटर है - रीगल सिनेमाज़ । यहाँ पर अंग्रेज़ी के साथ साथ भारतीय फिल्में भी लगती हैं - ऐसा नहीं कि अंग्रेज़ भी उन्हें देखते हैं, भारतीय दर्शक ही होते हैं हिन्दी फिल्मों के। अंग्रेज़ी के अनेक बडे बडे पोस्टर लगे रहते हैं यहाँ, पर कभी- कभार हिन्दी फिल्मों का भी एक पोस्टर दिख जाता है, जैसे अपनी पहचान बनाने के लिये प्रयासरत हो। यहाँ न्यू ज़र्सी में भारतीय रेस्टोरेंट्स में अंग्रेज़ों की संख्या देखकर मुझे सुखद आश्चर्य होता है।
मेरे एक सहकर्मी को भारत के बारे में इतनी जानकारी है कि यहाँ के भारतीयों को क्या होगी। आन्ध्र प्रदेश से उत्तर प्रदेश तक के बारे में जानता है (इन प्रदेशों के पूरे ना भी सही उच्चारित करता है) - यद्यपि वह कभी भारत नहीं गया। पिछले कुछ दिनों मे बहुत ही मज़ेदार घटनाएँ घटी हैं - कभी फुर्सत में बताऊँगा।
एक तितली
August 20, 2005 at 2:52 am | In Uncategorized | No Commentsबचपन में दूरदर्शन पर बहुत ही प्यारा एक सन्देश आता था:
‘ एक तितली- अनेक तितलियां’ । किसी की वेबसाइट पर भी कहीं था उस्का आडिओ य वीडियो..आप में से किसी को मिले तो बताना।
पिछ्ले कुछ दिन..
August 20, 2005 at 1:58 am | In Uncategorized | No Commentsपिछले कुछ दिनों से बहुत व्यस्त हो गया हूँ अतः कुछ लिख नहीं पाया। आज 1680 ए एम रेडिओ पर शाम को सत्यनारायण कथा सुनी। हर्ष भी हुआ आश्चर्य भी।
कुछ दिनो पहले अरोड़ा जी सपरिवार पास में ही आये थे..परंतु मिल नहीं सका! पिछले सप्ताहांत पर पिट्सबर्ग गया था…फिर ऐसे ही दिन गुज़रते गये..विचार आते गये…लपक-लपक कर पकड़ने की कोशिश करता रहा विचारों को…कल कुछ आगे लिखने की कोशिश करूंगा। हिन्दी एवं अन्य भाषाओं के बारे में विचार-विमर्श के लिये एक नया चिट्ठा बनाया है..इस बारे में फिर कभी…अभी तो सुबह के 2 बज गये हैं। शुभ रात्रि!
बदलता भारत
August 6, 2005 at 6:44 pm | In Uncategorized | 1 Commentआज सुबह से ही दर्ज़नों ब्लॉग पढ़्ने के बाद लगा कि कुछ लिख ही दिया जाए! अतुल जी की एक पुरानी ब्लॉग देखकर याद आया कि हमारे एक भारतीय सहकर्मी, जो कि पिछले कुछ वर्षों में भारत में नहीं रहे हैं, को भारत के बारे में पता ही नहीं है। उन्हें यहाँ विश्वास ही नहीं हो रहा था कि भारत में लोग कार से काम पर जाते हैं! मैक्डोनल्ड्स, पिज़ा हट मैं कल्लू के ढाबे से ज़्यादा भीड़ लगी रहती है!
अब चूंकि पिछले चार वर्षों में मुझे भारत में रहने का सौभाग्य प्राप्त था, मैंने यह परिवर्तन अपनी आंखों से देखा है। मैं बंगलोर में था पिछले चार वर्षों में, जहां रोज़ कुछ न कुछ नयी प्रगति के समाचार मिलते रहते थे। आगे फिर कभी…..
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