संभव है क्या?

August 22, 2005 at 11:12 pm | In Uncategorized | 1 Comment

मैने यहाँ एक कविता की पहली कुछ पंक्तियाँ दी है…इसे आगे बढ़ाने का प्रयास कीजिये-

इस एकाकी जीवन के तुम,
उल्लास बनो- संभव है क्या?

पतझड़ में सूखा बिरवा मैं,
मधुमास बनो- संभव है क्या?

मैं उड़ना चाहूं, तुम मेरे,
आकाश बनो- संभव है क्या?

———————-




Blog at WordPress.com. | Theme: Pool by Borja Fernandez.
Entries and comments feeds.