संभव है क्या?
August 22, 2005 at 11:12 pm | In Uncategorized | 1 Commentमैने यहाँ एक कविता की पहली कुछ पंक्तियाँ दी है…इसे आगे बढ़ाने का प्रयास कीजिये-
इस एकाकी जीवन के तुम,
उल्लास बनो- संभव है क्या?
पतझड़ में सूखा बिरवा मैं,
मधुमास बनो- संभव है क्या?
मैं उड़ना चाहूं, तुम मेरे,
आकाश बनो- संभव है क्या?
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लो अब आगे की मुझसे झेलो
मै लिखू ब्लाग अपना
तुम पाठक बनों - सम्भव है क्या?
हर रोज मै लिखूँ, जो मेरा मन कहे
तुम करो टिप्पणी प्रतिदिन – सम्भव है क्या?
Comment by Jitendra Chaudhary — August 24, 2005 #