एक शेर प्रेमियों के लिये
February 5, 2006 at 11:43 am | In Uncategorized | 4 Commentsकुंवारे प्रेमियों की (दुर्)गति पर ‘अनाम’ लखनवी ने लिखा है:
“ऐ ख़ुदा, ऐ रहनुमा कुछ इस तरह तरक़ीब कर
आशिक़ी के ग़म में बैठा यूँ कोई क्वांरा न हो”
मेरी पसन्द के कुछ शेर
February 5, 2006 at 12:43 am | In Uncategorized | Leave a Comment(शायरों के नाम नहीं मालूम)
किसी की रहमतों का तलबग़ार नहीं हूं-
बाज़ार से निकला हूँ ख़रीददार नहीं हूं
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मेरी हिम्मत को सराहो,मेरे हमराही बनो-
मैने इक शम्मा जला दी है हवाओं के ख़िलाफ
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हवा घरों में कहाँ इतनी तेज़ चला करती है-
मगर उसे तो मेरा दिया बुझाना था
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सबके होंठों पे तबस्सुम था मेरे क़त्ल के बाद-
जाने क्यों रो रहा था क़ातिल तन्हा
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