एक और ग़ज़ल
August 2, 2006 at 9:49 pm | In ग़ज़ल | 1 Commentचलिये, एक और झेलिये -
किया था जिसने वादा के चलेगा साथ मंज़िल तक
आज वो हमसफ़र नहीं दिखता
जिसके साए में नींद आ जाए
इधर अब वो शज़र नहीं दिखता
क़त्ल कितने भी होते रहते यूं ही आज दुनिया में
पर कोई चश्मे-तर नहीं दिखता
नज़रंदाज़ जैसा कर रहा है वो मगर मेरे
इश्क़ से बेख़बर नहीं दिखता
न जाने क्या कमी-सी रह गई मेरी इबादत में
दुआओं का असर नहीं दिखता
जाने कितनी मंज़िलें आईं-गयीं हैं पर
ख़त्म होता सफ़र नहीं दिखता
फ़तह हासिल जो करले ताक़ पर रख कर उसूलों को
‘ज़श्न’ मे वो हुनर नही दिखता
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झेला ।बढ़िया झेलाया। जल्दी-जल्दी झेलाया करो ना जी!
Comment by अनूप शुक्ला — August 3, 2006 #