होली के मौसम में मेरा चिट्ठा भी चोरी (?)
February 27, 2007 at 12:43 am | In मौज़-मस्ती, समसामयिक | 10 Commentsहोली-पूर्व की ठिठोली का आगाज़ करते हुए हम नवोदित चिट्ठाकारा लावण्या जी से अनुरोध करते हैं कि इस समस्या का हल बताएँ! उन्होंने अपने चिट्ठे का नाम भी ‘अंतर्मन’ रखा है…जिससे कुछ समस्याएं पैदा हो सकती है, जैसे कि कोई मेरे चिट्ठे पर अपना गुस्सा उतारने के बजाए उनके चिट्ठे पर उतार सकता है…या उनकी चिट्ठी की तारीफ़ मेरे चिट्ठे में कर सकता है। वगैरह-वगैरह। बात सीरियस टाइप की है
।
आप सब से गुज़ारिश है कि इस बार होली पर मस्त-मस्त लेख-कविताएँ लिख मारें। अरे इससे अच्छा मौज़-मस्ती का मौक़ा कहां मिलेगा। और साल भर जिसके बारे में जो भी कहना हो- कह डालो….क्योंकि – बुरा न मानो…..होली है!
चिट्ठाकारों का होली-मिलन इस साल कहाँ आयोजित हो रहा है?
आप सबको होली-सप्ताह की शुभकामनाएं, खासकर हमारी चिट्ठा-भाभियों को! अरे गुझिया-पापड़ वगैरह तैयार किये कि नहीं? रंग और गुलाल की दूकान इधर है -
10 Comments »
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भंग की तरंग मे आप दोनो को एक बिन मांगे सुझाव:
यार! टेन्शन मत लो। दोनो लोग मिलकर एक साझा ब्लॉग बनाओ, जिसका नाम रखो “अंतर्मन अब एक मन”
Comment by जीतू — February 27, 2007 #
भाई तरकश पर आपका सदैव स्वागत है…
होली से सम्बन्धित लेख, काव्य व्यंग्य इत्यादि तरकश को भेजिए…
contact@tarakash.com
Comment by Pankaj बेंगाणी — February 27, 2007 #
व्यंग भी नाजुक है आपके शब्द ने तो मन ही की बात धर दी…आपको भी होली की शुभकामनाएँ…
Comment by Divyabh — February 27, 2007 #
मुझे लगा आपने अपना चिट्ठा बेच दिया है.
प्रोत्साहीत हो मैने भी अपने चिट्ठे पर ‘फोर सेल’ का बोर्ड लगा दिया था.
होली मुबारक.
Comment by संजय बेंगाणी — February 27, 2007 #
वैसे मैं भी ये मानता हूँ कि दो चिट्ठे एक नाम से नहीं होने चाहिए। भ्रम होने के साथ ही पहचान भी गड़बड़ा जाती है।
Comment by Shrish — February 27, 2007 #
आपने तो नये नाम से कमेंट भी शुरु कर दिये थे, हल्दीराम की तरह:
अंतर्मन(ओरिजनल वाला)
तो यही जारी रखो न!! ये उपर दुकान में रंग जो सजाये हो,
वो भी तो सब ओरिजनल ही हैं न?
Comment by समीर लाल — February 27, 2007 #
डो.प्रभात टँडनजी,

नमस्ते !
“होली मुबारक हो !”
एक दिन विचार आया कि, बैठकर अपना ब्लोग बनाया जाये !
मेरा तकनीकि ज्ञान बहोत ही कम है पर उस दिन पता नहीँ कैसे
सारे निर्देश ठीक से अनुरसण करते हुए, मैँने, अपना चिठ्ठा ,
बना लिया — नाम “अन्तर्मन” ही सूझा !
जब गूगल पर ये नाम लिखा तो जवाब आया,” नाम पहले से
आरक्षित है” फिर वहीँसे सुझाव आया कि, “अन्तर्मन -अन्तर्मन” रख लो !”
तो, मैँने, सोचा चलो ठीक है — ये नहीँ सोचा कि, आगे चल कर, २ हिन्दी चिठ्ठोँ
के एकसे नाम से लोग पेशोपास मेँ पड सकते हैँ –
जीतू भी का सुझाव भी अच्छा है — परँतु, आप का जाल ~घर पहले से था सो, आपका हक्क है इस नाम पर !
शायद, एक “विशुध्ध हिन्दी चिठ्ठा” अगले कुछ दिनोँ मेँ शुरु करूँगी …अब तक तो सीख रही थी — ठीक है ना ?
स ~ स्नेह, सादर,
डो.प्रभात टँडनजी,
नमस्ते !
“होली मुबारक हो !”
एक दिन विचार आया कि, बैठकर अपना ब्लोग बनाया जाये !
मेरा तकनीकि ज्ञान बहोत ही कम है पर उस दिन पता नहीँ कैसे
सारे निर्देश ठीक से अनुरसण करते हुए, मैँने, अपना चिठ्ठा ,
बना लिया — नाम “अन्तर्मन” ही सूझा !
जब गूगल पर ये नाम लिखा तो जवाब आया,” नाम पहले से
आरक्षित है” फिर वहीँसे सुझाव आया कि, “अन्तर्मन -अन्तर्मन” रख लो !”
तो, मैँने, सोचा चलो ठीक है — ये नहीँ सोचा कि, आगे चल कर, २ हिन्दी चिठ्ठोँ
के एकसे नाम से लोग पेशोपास मेँ पड सकते हैँ –
जीतू भी का सुझाव भी अच्छा है — परँतु, आप का जाल ~घर पहले से था सो, आपका हक्क है इस नाम पर !
शायद, एक “विशुध्ध हिन्दी चिठ्ठा” अगले कुछ दिनोँ मेँ शुरु करूँगी …अब तक तो सीख रही थी — ठीक है ना ?
स ~ स्नेह, सादर,
लावण्या
Comment by लावण्या — February 28, 2007 #
जीतू भाई: इसे भी फ़्री जुगाड़ की लिस्ट में शामिल कर लें!
।
पंकज जी: धन्यवाद! अवश्य..पर इस बार होली इतनी ज़ल्दी आ रही है कि शायद तनी ज़ल्दी कोई लेख न लिख पाऊं।
दिव्याभ: शुक्रिया!
संजय: नहीं यार हमारा माल बिकाऊ नहीं है!
श्रीश: सही बोला।
लावण्या जी: आप ने मेरा परिचय गलत समझा! मैं डा. प्रभात टण्डन नहीं हूं! आपकी अपने चिट्ठे का नाम बदलने की पहल का
शुक्रिया..क्योंकि मेरे नाम बदलने से समस्या हल नहीं होती। हम चिट्ठाकारों का समूह अभी इतना छोटा और एक दूसरे के क़रीब है
कि एक ही नाम रखने से भ्रम हो सकता है। वैसे उससे शायद फ़ायदा मेरा ही होता
आने वाले समय में आशा है कि आपका लेखन दिन दूना रात आठ गुना बढ़ता रहे!
Comment by antarman — March 1, 2007 #
i like this tipe full enjoy pls given more this tipe my mail id in.
Thanks
Rohatash Swami
Comment by rohatash — June 9, 2007 #
इस अजनबी सी दुनिया में, अकेला इक ख्वाब हूँ.
सवालों से खफ़ा, चोट सा जवाब हूँ.
जो ना समझ सके, उनके लिये “कौन”.
जो समझ चुके, उनके लिये किताब हूँ.
दुनिया कि नज़रों में, जाने क्युं चुभा सा.
सबसे नशीला और बदनाम शराब हूँ.
सर उठा के देखो, वो देख रहा है तुमको.
जिसको न देखा उसने, वो चमकता आफ़ताब हूँ.
आँखों से देखोगे, तो खुश मुझे पाओगे.
दिल से पूछोगे, तो दर्द का सैलाब हूँ
Comment by rohatash — June 9, 2007 #