होली कविता

March 6, 2007 at 8:19 pm | In Uncategorized |

[यह कविता कुछ दिनों पहले लिखी थी, पर समयाभाव की वजह से पोस्ट नहीं कर पाया। शायद आपको पसंद आए।] 

हो मंगलमय सबकी होली।

जिसने-जिसने पहने थे
भीगे उसके लहँगा-चोली।

जीजाजी रँग हैं लगा रहे,
साली उनकी कितनी भोली।

सब नाच रहे भँगडा-पा कर
रँग लाई भंग की इक गोली।

लेकर पिचकारी-गुब्बारे,
निकली होलिहारों की टोली।

पान बनारस का खाके,
ठंडाई मेँ मिसरी घोली ।

गम अपने-अपने भूले जब,
मिल गए गले सब हमजोली ।

घुल गये होली के  रंगों में,
सब छाप-तिलक-चन्दन-रोली।

कोई कैसे चुपचाप रहे,
कोलाहल की तूती बोली

सुमधुर स्वर दसों-दिशाओं  में,
बागोँ मेँ कोयल है डोली।

शरमाए-से सूरज ने भी
किरणों की गठरी खोली।

हो मंगलमय सबकी होली।

-’अन्तर्मन’

7 Comments »

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

  1. बन्धु, सालियां भोली कहां है, बेचारे जीजाजी ही भोले हैं

    Comment by dhurvirodhi — March 6, 2007 #

  2. बहुत खूब! लेकिन ये बताओ-
    जिसने-जिसने पहने थे
    भीगे उसके लहँगा-चोली।

    इसका मतलब क्या है। कोई बिना पहने भी था क्या?

    Comment by अनूप शुक्ला — March 6, 2007 #

  3. अनूप भाई का जवाब दे लो और समझो कि हम भी तर गये!! हा हा!! :)

    Comment by समीर लाल — March 6, 2007 #

  4. अरे अनूप जी, शायद उनका कहना वही था, जो आपने अपने चिठ्ठे में प्रारम्भ में ही कहा था कि शेष तो जीन्स / जैकट वगैरह में।

    कविता सामयिक है भई।

    Comment by राजीव — March 7, 2007 #

  5. कविता के साथ साथ, अनूपजी, समीरजी और राजीवजी की टिप्पणियां वाह वाह वाह

    Comment by dhurvirodhi — March 7, 2007 #

  6. kya bat hai,dil kush ho gya

    Comment by shivam — April 11, 2008 #

  7. waha kya kavita hai holi ki yaade tazaa hogai
    mujhe to jab tak geelye na ho tab tak holi ka maja
    hi nahi aata

    Comment by kiran — May 13, 2008 #

Leave a comment

XHTML: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>

Blog at WordPress.com. | Theme: Pool by Borja Fernandez.
Entries and comments feeds.