ग़ज़ल

April 12, 2007 at 12:51 am | In ग़ज़ल | 6 Comments

हम खड़े तकते रहे इन आशियानों पर क़हर

ख्वाब सारे जल गए पर ना पड़ी उसकी नज़र

दूसरों के दर्द को भी देख आंखें न हों नम

ऐ ख़ुदा नाचीज़ को इस तू न दे ऐसा हुनर

निगल जाए जो कि खुद ही हर किनारे को

इस समंदर में हमें ना चाहिये ऐसी लहर

पहुंच कर मंज़िल पे धोख़ा दे दिया रहबर ने यूं

‘ज़श्न’ लुटता क़ारवां और सो रहा सारा शहर

पारसी एवं हिन्दू धरम - जतीन्द्र मोहन की पुस्तक

April 9, 2007 at 10:09 pm | In Uncategorized | 1 Comment

जतीन्द्र मोहन चटर्जी की इस पुस्तक (http://www.avesta.org/chatterj_opf_files/slideshow.htm)  को पढ़ कर देखिये। इसके प्रिफ़ेस में काफ़ी रोचक जानकारी है - बाकी पुस्तक में पारसियों की धर्म-पुस्तक ’गाथा’ का अनुवाद किया गया है।

चटर्जी साहब के अनुसार :

१. वेदों में वर्णित ’वरुण’ जो कि असुरों के देव हैं,  पारस ’सुर’ शब्द भारत के वासियों के लिये प्रयुक्त होता था। सुर के देव ’इन्द्र’ थे…जो कि  वरुण के मित्र थे। (वरुण-इन्द्र की एक साथ उपासना होती थी)। इन्द्र देव पारसी धर्म में ’मित्र’ के रूप में जाने जाते थे। ’असुर’शब्दशुरुआत में एक आदरणीय शब्द था जो कालांतर में ’दानव’ के लिये प्र्युक्त होने लगा।

२. ’अहुरा माज़्दा’ जो कि पारसीयों के ईश्वर हैं - वेदों में ’हरि मेधा’ के नाम से जाने जाते हैं।

३. वेदों में     वर्णित परशुुराम सम्भवतः पारसी महारथी थे।

४. पारसी (असुर) मूर्ति-पूज के विरुद्ध थे एवम ’सुर’ मूर्ति-पूजक थे।  देवासुर संग्राम ् इन्ही दोनों के बीच का ्युद्ध है।

इसके अलावा इस पुस्तक में अन्य बहुत सी बातें लिखी हैं। आप ही अपने विचार बताएं।

हमारा इतिहास: भाषाएँ/लिपियों में समानताएँ

April 7, 2007 at 3:22 am | In Uncategorized | 5 Comments

भाषा-लिपियों में मुझे बचपन से दिलचस्पी है। बचपन में मैंने थोड़ी बहुत बंगाली, तमिल, गुरमुखी, उड़िया, उर्दू (फ़ारसी) इत्यादि लिपियां सीखी थीं।

कुछ दिनों पूर्व अन्तरजाल पर पुरातन लिपियों के बारे में पढते हुए कुछ रोचक जानकारियां सामने आईं। यह विचार सामने आया कि क्या हमारे वैदिक/संस्कृत काल के महापुरुषों का फ़ारसी/ग्रीको-रोमन लोगों से कुछ लेना देना है? मायने यह कि लगता है कि हमारे पूर्वज कहीं इन देशों से तो नहीं थे, या कहीं इन देशों के ऐतिहासिक पुरुष भारत से तो नहीं थे? कुछ बेतरतीब विचार प्रस्तुत हैं,  फ़ुरसत मिलने पर इन्हें संयोजित करूंगा। अधिकतर जानकारी www.ancientscripts.com से साभार।

१. “ओल्ड पर्सियन”  में राजा के लिये ‘क्षत्रिय’ से मिलता जुलता एक शब्द प्रयुक्त होता था।

२. “भूमि” के लिये भी “भूमि” ,  भगवान के लिये “बग”, देश के लिये “दह्यौस” शब्द काफ़ी समान हैं। अन्य समानताएँ: http://en.wikipedia.org/wiki/Proto-Indo-Iranian

३. ‘कुरु’ कहीं ‘साइरस’ तो नहीं था (ओल्ड पर्सियन में Kūruš) (http://en.wikipedia.org/wiki/Kuru_%28kingdom%29)

४.  ‘अवेस्तन’ भाषा से संस्कृत की इतनी समानता क्यों? (http://en.wikipedia.org/wiki/Template:Iranian_Languages, लिपियों में समानता: देखें ‘अ’ ,’आ’, ‘इ’, ‘ओ’ , ट, ठ, ढ, म  http://www.ancientscripts.com/avestan.html)। यहाँ अन्तिम पैरा पढ़ें”

The ə symbol represents the mid central vowel (schwa) like the “e”s in “taken”.

    təm amavantəm yazatəm
    tam amavantam yajatam
     
    surəm damohu scvistəm
    suram dhamasu savistham
     
    miθrəm yazai zaoθrabyo
    mitram yajai hotrabhyah

५.  ओल्ड पर्सियन और देवनागरी वर्णमाला में काफ़ी समानताएं हैं। (http://www.ancientscripts.com/oldpersian.html)

६. देखें: http://www.avesta.org/chatterj_opf_files/slideshow.htm

७. कोरियन एवं देवनागरी में समानता: http://www.ancientscripts.com/korean.html. देखे: ट, र, म, प

८. ब्राह्मी लिपि एवन खरोष्ठी लिपि के काफ़ी अक्षर मध्य-पूर्वी लिपियों से मिलते हैं।

९. और तो और…कुछ जापानी अक्षर भी देवनागरी से मिलते-जुलते हैं।

आप इस बारे में अपने विचार भी मुझे बताएं। मैं आगे भी इस विषय पर जानकारी देता रहूंगा।

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