हमारा इतिहास: भाषाएँ/लिपियों में समानताएँ

April 7, 2007 at 3:22 am | In Uncategorized |

भाषा-लिपियों में मुझे बचपन से दिलचस्पी है। बचपन में मैंने थोड़ी बहुत बंगाली, तमिल, गुरमुखी, उड़िया, उर्दू (फ़ारसी) इत्यादि लिपियां सीखी थीं।

कुछ दिनों पूर्व अन्तरजाल पर पुरातन लिपियों के बारे में पढते हुए कुछ रोचक जानकारियां सामने आईं। यह विचार सामने आया कि क्या हमारे वैदिक/संस्कृत काल के महापुरुषों का फ़ारसी/ग्रीको-रोमन लोगों से कुछ लेना देना है? मायने यह कि लगता है कि हमारे पूर्वज कहीं इन देशों से तो नहीं थे, या कहीं इन देशों के ऐतिहासिक पुरुष भारत से तो नहीं थे? कुछ बेतरतीब विचार प्रस्तुत हैं,  फ़ुरसत मिलने पर इन्हें संयोजित करूंगा। अधिकतर जानकारी www.ancientscripts.com से साभार।

१. “ओल्ड पर्सियन”  में राजा के लिये ‘क्षत्रिय’ से मिलता जुलता एक शब्द प्रयुक्त होता था।

२. “भूमि” के लिये भी “भूमि” ,  भगवान के लिये “बग”, देश के लिये “दह्यौस” शब्द काफ़ी समान हैं। अन्य समानताएँ: http://en.wikipedia.org/wiki/Proto-Indo-Iranian

३. ‘कुरु’ कहीं ‘साइरस’ तो नहीं था (ओल्ड पर्सियन में Kūruš) (http://en.wikipedia.org/wiki/Kuru_%28kingdom%29)

४.  ‘अवेस्तन’ भाषा से संस्कृत की इतनी समानता क्यों? (http://en.wikipedia.org/wiki/Template:Iranian_Languages, लिपियों में समानता: देखें ‘अ’ ,’आ’, ‘इ’, ‘ओ’ , ट, ठ, ढ, म  http://www.ancientscripts.com/avestan.html)। यहाँ अन्तिम पैरा पढ़ें”

The ə symbol represents the mid central vowel (schwa) like the “e”s in “taken”.

    təm amavantəm yazatəm
    tam amavantam yajatam
     
    surəm damohu scvistəm
    suram dhamasu savistham
     
    miθrəm yazai zaoθrabyo
    mitram yajai hotrabhyah

५.  ओल्ड पर्सियन और देवनागरी वर्णमाला में काफ़ी समानताएं हैं। (http://www.ancientscripts.com/oldpersian.html)

६. देखें: http://www.avesta.org/chatterj_opf_files/slideshow.htm

७. कोरियन एवं देवनागरी में समानता: http://www.ancientscripts.com/korean.html. देखे: ट, र, म, प

८. ब्राह्मी लिपि एवन खरोष्ठी लिपि के काफ़ी अक्षर मध्य-पूर्वी लिपियों से मिलते हैं।

९. और तो और…कुछ जापानी अक्षर भी देवनागरी से मिलते-जुलते हैं।

आप इस बारे में अपने विचार भी मुझे बताएं। मैं आगे भी इस विषय पर जानकारी देता रहूंगा।

5 Comments »

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  1. जानकारी बहुत अच्छी है, परंतु आपकी टैम्पलेट देख कर आँखें चौंधिया जाती है, पढ़ना थोड़ा कठिन लगता है।

    Comment by अतुल शर्मा — April 7, 2007 #

  2. जानकारी रोचक है।
    किंतु लिपि व भाषा में घालमेल हो रहा है। भाषा का एक दूसरे पर प्रभाव सभी भारोपीय भाषाओं में दिखाई देता है। जहॉं तक लिपि का सवाल है वह एक अलग सवाल है और सिंधु की सभ्‍यता लिपि तो एक बड़ी पहेली है ही अभी तक।

    गुणाकर मुले की एक बेहद रोचक पुस्‍तक है लिपियों पर।

    Comment by masijeevi — April 7, 2007 #

  3. रोचक जानकारी!!

    Comment by समीर लाल — April 7, 2007 #

  4. आपने टैम्पलेट बदल दी, अब आपका चिट्ठा बहुत सुंदर लग रहा है।
    भाषा और लिपि पर आपने शायद खोजबीन की है। आपके द्वारा दी गईं लिंक्स में पढ़ने के बहुत सामग्री है। यदि आप हिन्दी में इस बारे में और विस्तार से कुछ बता सकें तो सभी के लिए लाभकारी होगा।

    Comment by अतुल शर्मा — April 9, 2007 #

  5. अतुल जी: वो हरा टेम्पलेट होली के दिन लगाया था…फ़िर साइट पर नहीं आया…अब बदल दिया है…पसंद करने के लिये शुक्रिया…फ़ुरसत मिलने पर आगे लिखा जाएगा…वैसे गूगल बुक्स पर इस बारे में और पुस्तकें मिल सकती हैं…फ़्री में पढ़ने को…पारसी धर्म वाक़ई बहुत रोचक है…शायद मानवता द्वारा अपनाए गए धर्मों में से सबसे पुराने धर्मों में से है। यह दुख की बात है कि अब पारसीयों की संख्या बहुत कम रह गई है…और शायद कोई भी इस धर्म के रहस्यों को समझा न सके।
    मसिजीवी जी: रात के ३ बजे यह पोस्ट लिखी…घालमेल के लिये पहले ही क्षमा मांग चुका हूं ;-) मुले जी की पुस्तक का नाम बताएं।
    समीर जी: धन्यवाद!

    Comment by antarman — April 11, 2007 #

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