ग़ज़ल
April 12, 2007 at 12:51 am | In ग़ज़ल |हम खड़े तकते रहे इन आशियानों पर क़हर
ख्वाब सारे जल गए पर ना पड़ी उसकी नज़र
दूसरों के दर्द को भी देख आंखें न हों नम
ऐ ख़ुदा नाचीज़ को इस तू न दे ऐसा हुनर
निगल जाए जो कि खुद ही हर किनारे को
इस समंदर में हमें ना चाहिये ऐसी लहर
पहुंच कर मंज़िल पे धोख़ा दे दिया रहबर ने यूं
‘ज़श्न’ लुटता क़ारवां और सो रहा सारा शहर
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बहुत खूब गजल लिखने के लिये बधाई
पहुंच कर मंज़िल पे धोख़ा दे दिया रहबर ने यूं
‘ज़श्न’ लुटता क़ारवां और सो रहा सारा शहर
बहुत अच्छे भाव और सहज अभिव्यक्ति
Comment by योगेश समदर्शी — April 12, 2007 #
very nice.
Comment by ratna — April 12, 2007 #
दूसरों के दर्द को भी देख आंखें न हों नम
ऐ ख़ुदा नाचीज़ को इस तू न दे ऐसा हुनर
आप ने दूसरों का दर्द मह्सूस किया यह इन्सानियत की सबसे बडी खूबी है…
सुन्दर गजल… मुबारक हो
Comment by Mohinder Kumar — April 12, 2007 #
bahut khoob likha hai ji ..
Comment by ranjana — April 12, 2007 #
योगेश, मोहिन्दर , रत्ना एवं रंजना जी: हौसला आफ़ज़ाई के लिये आप सब का शु्क्रिया! खुशी हुई जानकर कि आप को कुछ शेर पसंद आए। आगे भी ऐसी ही कोशिश रहेगी!
Comment by antarman — April 15, 2007 #
ham khare takte rahe in aasiano par kahar
and
jashn lutata karwan aur so raha sara shahar
Comment by sandeep — June 22, 2007 #