नव-वर्ष की नई तुकबंदी
January 7, 2007 at 12:54 pm | In कविता, समसामयिक, हास्य-व्यंग्य | 12 Commentsजब तक तुकबंदी करने पर कोई टैक्स नहीं लगता है…हम भी लिखते रहेंगे!
कुछ दिनों पहले जब मैं पुराने साल के धूल-जंग लगे दिये की साफ़-सफ़ाई कर रहा था तो उसमें से एक धुंधला-सा चेहरा दिखा….अचानक वो दिये से बाहर निकला और मुझसे बोला- “पहचान कौन?”। मैने अचकचाकर ज़वाब दिया..”याद नहीं आ रहा….?”। उसने अपना परिचय दिया - “मैं नये साल का जिन्न..अपनी नये साल की ख़्वाहिशें बता?” । खैर.. हमने तुरंत अपनी ‘न्यू इयर विशेज़’ की एक तुकबंदी की..और उसे सुना दी..अब यह आपके सामने पेश है:
हर इक चिट्ठे में पोस्ट रहे
बुश मिडिल ईस्ट का दोस्त रहे,
सबकी प्लेटों में टोस्ट रहे,
पार्टी में मुर्गा-रोस्ट रहे।
सलमानों पर शर्ट रहे
मलिकाओं पर स्कर्ट रहे
अपने-अपने धंधे में,
हर इक बंदा एक्स्पर्ट रहे।
चेहरों पर हर्ष विशेष रहे,
बढ़ता अपना विनिवेश रहे,
विकसित देशों की सूची में,
सर्वोपरि अपना देश रहे।
इन्सानों में मेल रहे,
इन्बाक्सों में ई-मेल रहे,
ओलंपिक खेलों की सूची में,
गुल्ली-डंडा भी खेल रहे ।
पूरी के संग भेल रहे,
पटरी पर हर इक रेल रहे,
गुंडों को तिहाड़ की जेल रहे,
कम्फ्यूटर वायरस फ़ेल रहे।
हर इक दीपक में तेल रहे,
दूकानों में सेल रहे,
असुरक्षित जीवों की श्रेणी से,
बाहर मानव और व्हेल रहे।
राष्ट्रों में विचार-विमर्श रहे,
हर दिन अपना नव-वर्ष रहे,
हम सब भक्तों के मस्तक पर,
ईश्वर-कर का स्पर्श रहे।
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