रोमनागरी-२

February 10, 2007 at 5:04 pm | In चिंतन, समसामयिक, समाज | No Comments

(इस लेख में “लोगों” शब्द से मेरा तात्पर्य भारत की अधिकांश हिन्दी-भाषी जनता से है। मैं हिन्दी चिट्ठाकार-समूह की बात नहीं कर रहा, जिनके प्रयत्न से हिन्दी को नया आयाम मिला है और हिंदी का भविष्य और भी उज्ज्वल हुआ है| )

लोग परेशान हैं कि केकता कपूर टीवी धारावाहिकों के नामों की ‘स्पेलिंग’ को क्यों बिगाड़ रही है। जी हाँ, हिन्दी के शब्दों की रोमन वर्तनी की ग़लतियां लोगों को परेशान कर रही है। कितने लोगों को यह चिंता है..कि ये हिंदी के शब्द देवनागरी में क्यों नहीं लिखे जा रहे हैं। धीरे-धीरे जनसाधारण के मस्तिष्क मे‍ हिन्दी को रोमन में पढ़्ने व लिखने की आदत सी हो गई है।

हिन्दी फ़िल्मों में भी लोगों के नाम इत्यादि रोमन में ही दिखाए जाते हैं। विडम्बना यह है कि फ़िल्म के पैसे (अधिकतर) हिंदी-भाषी लोगों से वसूले जाते हैं, और हिंदी की अपनी लिपि से परहेज़ है। कुछ लोग कहेंगे कि हिंदी फ़िल्मों का दर्शक-वर्ग अन्य भाषाओं का भी होता है..और उनकी सुविधा के लिये ही रोमन में लिखा जाता है। परंतु समस्या यह है कि इस दर्शक वर्ग को हिंदी की अपनी लिपि से दूर क्यों रखा जा रहा है? अरे अधिक से अधिक देवनागरी के साथ रोमन में भी लिख दो। शायद कई अहिंदी-भाषी लोगों को ऐसा लगने लगा होगा कि हिंदी रोमन में ही लिखी जाती है।

कुछ दिनों पूर्व मेरी एक विदेशी नागरिक से बात हुई, जो कि मौक़ा लगने पर हिंदी फ़िल्में भी देखता है। उसको लग रहा था कि हिंदी की लिपि रोमन ही है। इस वार्तालाप के पश्चात मुझे बहुत ग्लानि हुई, और मुझको लगा कि हम रोमन में लिखकर लोगों को कितना ग़लत संदेश दे रहे हैं।

यदि आप क्षेत्रीय भाषाओं की फ़िल्मों अथवा टीवी चैनलों को देखेंगे तो पाएंगे कि इनमें अधिकतर अपनी लिपि का ही प्रयोग होता है। क्या इन फ़िल्मों या चैनलों को अन्य भाषा के लोग नहीं देखते?

हिंदी-फ़िल्मों के पोस्टर आपने कितनी बार हिंदी में लिखे देखें है?

हिंदी भाषी नगरों में अधिकतर नाम-पट्ट (घरों अथवा दूकानों) के सिर्फ़ अंग्रेज़ी में ही लिखे होते हैं, इसकी अपेक्षा क्षेत्रीय भाषाओं के नगरों में पिज़ा हट से लेकर डोमिनोज़ तक सब अपने नाम-पट्ट उन स्थानीय भाषा-लिपियों में भी लिखते हैं। मैं ग़लत हूं तो बताइये।

हिंदी तो किसी की भाषा ही नहीं रह गई है…यह सबकी हो गई है…और जिसका जैसा मन हो वह उस प्रकार उपयोग कर रहा है।

इट्स हाई टाइम वी गॉट सीरियस एबाउट दिस इश्यू!

सुविचार

July 31, 2006 at 9:45 pm | In चिंतन, सुविचार | No Comments

“हम समस्याओं को उसी मानसिकता का उपयोग करके नहीं हल कर सकते जिस मानसिकता के द्वारा हमने उन समस्याओं को उत्पन्न किया है।”

-अल्बर्ट आइन्स्टीन

इस हफ़्ते

July 15, 2006 at 12:53 am | In चिंतन, समसामयिक | No Comments

इस सप्ताह मुम्बई विस्फोट के समाचार ने बहुत दुखी कर दिया…आखिर कब खत्म होगा ये सब?२००-२५० लोग…क्या कम हैं? भारत कीम ज़बूरियां क्या है?? दो सैनिकों का अपहरण हुआ और इज़्रायल ने हिज़्बोल्ला पर चढ़ाई कर दी। जाने कहां थमेगा ये सब! यहां अमरीका मे‍ तो सुबह शाम इरान, ईराक, इस्रायल, सीरिया सुनाई देता है समाचारो‍ मे‍ हर मिनट!

“विस्फोट पाकिस्तान ने करवाया है”…अरे रोको उसे!!

लेबनान की सरकार कह रही थी कि हिज़बुल्ला उसके कन्ट्रोल मे‍ नही‍ है…तो इसरायल ने बोला ..तुम नही‍ कर सकते तो हम कर देते है‍।  हालांकि पाकिस्तान के परमाणविक देश होने के कारण समीकरण यहां अलग है…पर फ़िर भी…कुछ करना पड़ेगा भाई!

मुझे लग रहा है कि इन पागलो‍ का अगला निशाना बैंगलोर है।

खैर..आजकल व्यस्तताओ‍ के चलते चिट्ठा लेखन-पठन सामान्यतया सप्ताहान्त पर ही कर पाऊंगा…आशा है आपका सहयोग यथावत बना रहेगा…और यदि आपके चिट्ठे पर मेरी टिप्पणी एक हफ़्ते बाद आती है तो वजह समझ जाइयेगा…यहां पर आते रहिये!

बदलता समाज और मेल-मिलाप

April 22, 2006 at 12:21 am | In चिंतन, समाज | 1 Comment

यह पहली बार नहीं है जब मैं यह सोच रहा हूँ। पिछले कुछ दिनों मे गाड़ी चलाते समय भिन्न भिन्न प्रकार के विचार आये परंतु घर आते ही सब गायब..और फिर समय नहीं मिल सका। कभी सोचा कि बचपन की किसी घटना के बारे में लिखूं…फिर कभी सोचा कि हिन्दी के बारे में लिखूँ। फिर कभी सोचा कि कोई कविता लिखी जाए…पर इस सब के लिये समय का होना ज़रूरी है…और ज़रूरी है कि संगणक के सामने आने तक विचार याद रहें।
खैर …पिछले कुछ हफ्तों से पास के मन्दिर में कई बार गया। पहले तो नवरात्र के दौरान और फिर 'अखंड रामायण' (रामचरित मानस पाठ) के दौरान। रामचरित मानस पाठ मे लोगों की श्रद्धा देख कर मैं चकित हो गया। अपने बचपन के दिन याद आ गये जब हम लोगों के यहाँ पाठ करने जाते थे या लोग हमारे यहाँ आते थे। आज लोग कितने व्यस्त हो गए हैं। न किसी के पास किसी और के यहाँ जाने का बहाना है न कोई अपने यहाँ लोगों को आने का न्योता दे रहा है। ऐसा नहीं कि कोई किसी के यहाँ आता जाता नहीं, पर अब अवसर कम हो गये हैं और औपचारिकता मात्र रह गयी है (जन्मदिन वगैरह) । लोगों का व्यवहार-वृत्त सिकुड़ गया है। मनोरंजन के तरीके भी ऐसे हो गये हैं कि जिसमें बस दो चार लोगो के ग्रुप से ही काम चल जाए । ऐसा नहीं कि दर्ज़न भर पड़ोसी मिल कर एक साथ एक फिल्म या 'रामायण' सीरियल का मज़ा लें। सब के पास अपने अपने साधन हो गये हैं और मिल बांट कर खाने का कोई बहाना ही नहीं रह गया है।
बचपन में मैं जब लोगों से सुनता था कि बम्बई जैसे शहर में पड़ोसी एक दूसरे को जानते तक नहीं हैं तब मुझे घोर आश्चर्य होता था और सोचता था कि मैं कितना किस्मतवाला हूं जो ऐसे शहर में नहीं हूँ। पर बाद में जहाँ भी रहा, शायद ही कोई पड़ोसी अपने पड़ोसी को जानता हो। मुझे याद है कि हमारे घर में एक दुखद घटना की खबर देने हमारे पड़ोस की आंटी ऐसे रोते हुए आई थीं जैसे उनके घर में कुछ हो गया हो। (हमारे यहाँ फोन नहीं था अत: यह खबर किसीने उनको फोन पर देकर हमें बताने को कहा था)। आस पास के पड़ोसियों के रिश्तेदारो को भी अपने ही रिश्तेदार की तरह समझते थे लोग। आज हमारे एक ही घर में सेल्फोन वगैरह मिला कर 4-5 फोन हो गये हैं और एक एक को अलग अलग फोन करना पड़ता है। वक़्त बदला और सबके पास अपने अपने रंगीन टीवी -वीसीआर हो गये और अब कोई किसी के यहाँ 'महाभारत' या 'रामलखन' देखने नहीं जाता। बचपन में मेरे घर पर हुई 'वीसीआर' पार्टी (योँ) पर इतने सारे बड़े बूढ़े और बच्चे इकट्ठा होते थे कि मज़ा आ जाता था। 'रामायण' देखने तो लोग अपने दूर दूर के दोस्तों को बुला कर लाते थे…वो भी बिना पूछी हुए…और हम सबका अपने मेहमान की तरह स्वागत करते और एक एक के लिये चाय पानी का इंतेज़ाम करते। कई कई बार तो करीब चालीस लोग हो जाते…और कोई भी पूर्व सूचना या निमंत्रण देकर नहीं आता था। सोचिये हर हफ्ते पार्टी बिना किसी बुलावे के!
समाज/विज्ञान की प्रगति भी लोगों में बढ़्ती दूरियोँ का कारण है। सोचिये जब लोगों के सारे काम (रेल टिकट या खरीदारी) जब इंटर्नेट या फोन पर हो जाएँ तो लोग एक दूसरे से क्यों बोलेंगे? रेल टिकट में धांधली नहीं होगी तो शुक्ला जी को रेल विभाग के गुप्ता जी से 'स्पेशल कोटा ' वाला टिकट का इंतेज़ाम करने के लिये क्योँ कहना पड़ेगा? सब्ज़ी की होम डेलेवरी होती है तो श्रीवास्तव जी और तिवारी जी क्यों एक साथ थैला लेकर बाज़ार जायेंगे? अब अगर हर डिपाट्मेंट में करप्शन नहीं होगा हमें दर्ज़नों पड़ोसियों से सहायता क्यों लेनी पड़ेगी।
ज़रा सोचिये…कि अगर यह इंटर्नेट नहीं हो तो मैं यह ब्लोग लिखने के बजाए किसी पड़ोसी/मित्र के पास जाकर यही बातें उसको बता रहा होता, और इस तरह वार्तालाप/मेल-मिलाप का एक और बहाना मिलता। आप क्या सोचते हैं?

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