एक पक्षी

अप्रैल 24, 2006 को 6:16 पूर्वाह्न | Posted in छायाचित्र | 4 टिप्पणियाँ

एक पक्षी

एक पक्षी

हिन्दी में ब्लॉग-लेखन के फायदे :

अप्रैल 24, 2006 को 12:05 पूर्वाह्न | Posted in हास्य-व्यंग्य | टिप्पणी करे

मेरे हिसाब से हिन्दी में ब्लॉग-लेखन के यह फायदे है:

  1. बहुत कम सम्भावना है कि आपका बॉस हिन्दी में 'गूगल' करके आपके ब्लॉग तक पहुँच जाएगा! 🙂
  2. 'इंडिया' वालों को लगेगा कि अनिवासी भारतीयों को अपनी भाषा पर इतना गर्व और प्रेम है, तो शायद उन्हें भी कुछ प्रेरणा मिलेगी।
  3. आप 'भेड़चाल' से बाहर रहकर अपनी भाषा, अपने शब्दों में अपने विचार रखेंगे, जो कि एक 'टार्गेटेड ऑडिएंस' तक पहुंचेगी – गूगल के 'ऐडवर्ड्स' की तरह|
  4. आपके 'फेमस' होने और/अथवा ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने की सम्भावना अधिक बढ़ जाती है (अंग्रेज़ी की अपेक्षा।
  5. हिन्दी का प्रचार-प्रसार और सेवा करने का मौक़ा मिलता है – एक तीर से दो शिकार की तरह!
  6. भाभीजी यह ब्लॉग कम (या नहीं) देखेंगी , और आपके द्वारा लिखे गये भूतपूर्व (या करेंट) प्रेम-प्रसंगों पर उनकी नज़र जाने की सम्भावना कम हो जाती है। उनके टिप्पणी करने की सम्भावना और भी कम हो जाती है (हिन्दी टंकण और भी कठिन है)।

नमस्ते विश्व!

अप्रैल 22, 2006 को 11:12 अपराह्न | Posted in नया-नवेला | 1 टिप्पणी

बस देख रहा हूँ कि वर्ड्प्रेस ब्लॉगर.कॉम से बेहतर है या नहीं!

स्वचालित ग्राहक सेवा से परेशान?

अप्रैल 22, 2006 को 5:43 अपराह्न | Posted in Uncategorized | टिप्पणी करे

यह कड़ी देखें –
gethuman tips

धरा दिवस

अप्रैल 22, 2006 को 5:11 अपराह्न | Posted in Uncategorized | टिप्पणी करे

यह देखिये – ‘धरा दिवस’ पर माइक्रोसॉफ्ट द्वारा एक शोशेबाज़ी!
Photos: Microsoft goes solar | CNET News.com

बदलता समाज और मेल-मिलाप

अप्रैल 22, 2006 को 12:21 पूर्वाह्न | Posted in चिंतन, समाज | 1 टिप्पणी

यह पहली बार नहीं है जब मैं यह सोच रहा हूँ। पिछले कुछ दिनों मे गाड़ी चलाते समय भिन्न भिन्न प्रकार के विचार आये परंतु घर आते ही सब गायब..और फिर समय नहीं मिल सका। कभी सोचा कि बचपन की किसी घटना के बारे में लिखूं…फिर कभी सोचा कि हिन्दी के बारे में लिखूँ। फिर कभी सोचा कि कोई कविता लिखी जाए…पर इस सब के लिये समय का होना ज़रूरी है…और ज़रूरी है कि संगणक के सामने आने तक विचार याद रहें।
खैर …पिछले कुछ हफ्तों से पास के मन्दिर में कई बार गया। पहले तो नवरात्र के दौरान और फिर 'अखंड रामायण' (रामचरित मानस पाठ) के दौरान। रामचरित मानस पाठ मे लोगों की श्रद्धा देख कर मैं चकित हो गया। अपने बचपन के दिन याद आ गये जब हम लोगों के यहाँ पाठ करने जाते थे या लोग हमारे यहाँ आते थे। आज लोग कितने व्यस्त हो गए हैं। न किसी के पास किसी और के यहाँ जाने का बहाना है न कोई अपने यहाँ लोगों को आने का न्योता दे रहा है। ऐसा नहीं कि कोई किसी के यहाँ आता जाता नहीं, पर अब अवसर कम हो गये हैं और औपचारिकता मात्र रह गयी है (जन्मदिन वगैरह) । लोगों का व्यवहार-वृत्त सिकुड़ गया है। मनोरंजन के तरीके भी ऐसे हो गये हैं कि जिसमें बस दो चार लोगो के ग्रुप से ही काम चल जाए । ऐसा नहीं कि दर्ज़न भर पड़ोसी मिल कर एक साथ एक फिल्म या 'रामायण' सीरियल का मज़ा लें। सब के पास अपने अपने साधन हो गये हैं और मिल बांट कर खाने का कोई बहाना ही नहीं रह गया है।
बचपन में मैं जब लोगों से सुनता था कि बम्बई जैसे शहर में पड़ोसी एक दूसरे को जानते तक नहीं हैं तब मुझे घोर आश्चर्य होता था और सोचता था कि मैं कितना किस्मतवाला हूं जो ऐसे शहर में नहीं हूँ। पर बाद में जहाँ भी रहा, शायद ही कोई पड़ोसी अपने पड़ोसी को जानता हो। मुझे याद है कि हमारे घर में एक दुखद घटना की खबर देने हमारे पड़ोस की आंटी ऐसे रोते हुए आई थीं जैसे उनके घर में कुछ हो गया हो। (हमारे यहाँ फोन नहीं था अत: यह खबर किसीने उनको फोन पर देकर हमें बताने को कहा था)। आस पास के पड़ोसियों के रिश्तेदारो को भी अपने ही रिश्तेदार की तरह समझते थे लोग। आज हमारे एक ही घर में सेल्फोन वगैरह मिला कर 4-5 फोन हो गये हैं और एक एक को अलग अलग फोन करना पड़ता है। वक़्त बदला और सबके पास अपने अपने रंगीन टीवी -वीसीआर हो गये और अब कोई किसी के यहाँ 'महाभारत' या 'रामलखन' देखने नहीं जाता। बचपन में मेरे घर पर हुई 'वीसीआर' पार्टी (योँ) पर इतने सारे बड़े बूढ़े और बच्चे इकट्ठा होते थे कि मज़ा आ जाता था। 'रामायण' देखने तो लोग अपने दूर दूर के दोस्तों को बुला कर लाते थे…वो भी बिना पूछी हुए…और हम सबका अपने मेहमान की तरह स्वागत करते और एक एक के लिये चाय पानी का इंतेज़ाम करते। कई कई बार तो करीब चालीस लोग हो जाते…और कोई भी पूर्व सूचना या निमंत्रण देकर नहीं आता था। सोचिये हर हफ्ते पार्टी बिना किसी बुलावे के!
समाज/विज्ञान की प्रगति भी लोगों में बढ़्ती दूरियोँ का कारण है। सोचिये जब लोगों के सारे काम (रेल टिकट या खरीदारी) जब इंटर्नेट या फोन पर हो जाएँ तो लोग एक दूसरे से क्यों बोलेंगे? रेल टिकट में धांधली नहीं होगी तो शुक्ला जी को रेल विभाग के गुप्ता जी से 'स्पेशल कोटा ' वाला टिकट का इंतेज़ाम करने के लिये क्योँ कहना पड़ेगा? सब्ज़ी की होम डेलेवरी होती है तो श्रीवास्तव जी और तिवारी जी क्यों एक साथ थैला लेकर बाज़ार जायेंगे? अब अगर हर डिपाट्मेंट में करप्शन नहीं होगा हमें दर्ज़नों पड़ोसियों से सहायता क्यों लेनी पड़ेगी।
ज़रा सोचिये…कि अगर यह इंटर्नेट नहीं हो तो मैं यह ब्लोग लिखने के बजाए किसी पड़ोसी/मित्र के पास जाकर यही बातें उसको बता रहा होता, और इस तरह वार्तालाप/मेल-मिलाप का एक और बहाना मिलता। आप क्या सोचते हैं?

‘झूठा ही सही’ – सिम्प्संस में

अप्रैल 9, 2006 को 8:36 अपराह्न | Posted in Uncategorized | टिप्पणी करे

अभी अभी सिम्प्संस देखा- आज के एपिसोड में भारत को आउट्सोर्सिंग पर मज़ाक था। जो अच्छा लगा वह था करीब 2 मिनट तक पार्श्व संगीत में जोर शोर से बज रहा था- ‘झूठा ही सही- पल भर के लिये कोई मुझे प्यार कर ले’ ।

वसंत शुभागमन

अप्रैल 5, 2006 को 10:40 अपराह्न | Posted in Uncategorized | टिप्पणी करे


कुछ दिन पहले सुबह उठा तो देखा बालकनी के सामने वाले पेड़ पर फूल ही फूल थे!

वसंत

अप्रैल 1, 2006 को 8:22 अपराह्न | Posted in Uncategorized | 3 टिप्पणियाँ

जी हाँ, विश्व के उस कोने में जहां मैं रहता हूं, वसंत काआगमन अब शुरु हुआ है…मुझे याद आ रही है स्कूल में लिखी मेरी कविता की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं-
“आया प्यारा वसंत”
पेड़ों पर पात नये,
भँवरोँ के दिन बहुरे,
कुसुमित हैं दिग-दिगंत –
आया प्यारा वसंत।

आगे की पंक्तियाँ नहीं याद आ रहीं….

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