ग़ज़ल

जुलाई 23, 2006 को 9:23 अपराह्न | Posted in नया-नवेला, ग़ज़ल | 6 टिप्पणियाँ

जलता रहने दे इन चराग़ों को
अँधेरों का हिसाब बाक़ी है

रात ये खत्म नहीं होती है
दीद-ए-माहताब (१) बाक़ी है

कुछ भी खोने का तू ग़म मत कर
क़त्ल-ए-क़ायनात बाक़ी है

ज़ुल्म तेरे नहीं चल पाएँगे
जहाँ में इंक़िलाब बाक़ी है

फ़िज़ाँ में अब तलक खुशबू सी है
चमन में एक गुलाब बाक़ी है

कहते हैं लोग के बदी (२)मत देख
हम में होशो-हवाश बाक़ी है

खेल ये ख़त्म यूँ नहीं होगा
अभी अपना ज़वाब बाक़ी है

कुछ भी कह मुझको बेवफ़ा मत कह
अभी वो ही ख़िताब बाक़ी है

बचा के रख तू आबरू अपनी
अभी तेरा रुआब बाक़ी है

कहता रह दास्तान ये अपनी
इश्क़ की इक किताब बाक़ी है

‘ज़श्न’ मत तोड़ अभी पैमाना
बोतलों में शराब बाक़ी है

(१)- चाँद का दिखना
(२)- बुराई

6 टिप्पणियाँ »

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  1. ये तो बढ़िया लिखा भाई!
    hindini.com/fursatiya

  2. धन्यवाद अनूप जी!

  3. jalta rahna de in chrogo ko
    andhera ka hisab baki ha
    wah bhai wha bhaut achi gajal ha

  4. धन्यवाद सुरेश जी! अच्छा लगा कि आपको शेर पसन्द आया!

  5. wakayee aapne adab ka khayal rakha hai

  6. विजेन्द्र जी, धन्यवाद, अपनी साइट का भी लिन्क भेजिये!


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