रोमनागरी

जनवरी 18, 2007 को 10:13 अपराह्न | Posted in समसामयिक, समाज | 8 टिप्पणियाँ

Aajakal Indian that is Bharateeya media mein roman script mein hindi ke shabd dekhkar lagta hai ki log devanaagari ko nasht karane mein lage hain.Ham sasure bilaagar log bekar hee mein devanaagari mein likhane ke liye itanee mehanat mashakkat kar rahe hain!! Are aaj se 10 saal baad India mein devanaagari samajhane waala koi naheen milega…are jab devanaagari mein likha hi naheen jaa rahaa to seekhne-samajhane ki zaroorat hi kya hai.

 Hindi ko roman letters mein likhkar,  oopparr sse uskii spelling terhhi merhhi karr do to mazzaah hi alaggh hai!  Hindi mein program hai…hindi speaking darshak dekh rahe hain..hindi darshakon se paise liye jaa rahe hain…angrezee dikhane ke liye! Kassammh se!!

Are bhaai kyaa kamee hai apanee devanaagaree mein jo ki hamein roman ka sahara lena pad raha hai?
    Raajaneetik aur vaicharik daasata (slavery) apanaana bahut aasaan hai. Dekhiye mera ye lekh roman mein likhanaa kitna aasaan tha! Shaayad aapko padhane mein bhi zyaadaa asani hui hogi!!

देवनागरी देवों के लिये छोड़ दी है!  इंडिया के रोम-रोम में रोम रम गया है!

8 टिप्पणियाँ »

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  1. रोमन में पढ़ते हुए काफी कष्ट हुआ.
    प्रगतिशीलता दिखाने के लिए अंग्रेजी में बोलते लोगो को देखा होगा आपने, वैसे ही रोमन लिपि में हिन्दी लिखना भी शायद नई चाल (फैशन) होगी.

    वैसे आपने किस चैनल में देख लिया? मैंने तो हाल ही में एक खेल चैनल पर पहली बार क्रिकेट के स्कोर वगेरे हिन्दी (देवनागरी) में देखे. खुशी भी हुई.
    हमारा सरकारी चैनल ऐसा न करता.

  2. आपका लेख अच्छा लगा। जिस तरह से आपने रोमन लिपि में हिंदी लिखने वालों को जवाब दिया है – अपने लेख द्वारा, वैसा ही कुछ मैं भी किया करता हूँ लेकिन थोड़े अलग तरीक़े से। वट आए डू इज़ दैट आए स्टार्ट राइटिंग इंग्लिश वर्ड्‌ज़ यूज़िंग द देवनागरी स्क्रिप्ट। वेनेवर आए राइट लाइक दिस टू समवन, दे इनएविटेब्ली ऐस्क मी वाए आए हैव टू मेक लाइफ़ डिफ़िकल्ट फ़ॉर देम। ऐंड माए मैसेज गेट्स् कन्वेड ऑटोमैटिकली।

  3. यह कैसे सोच लिया कि दस साल बाद हिन्दी समझने वाला कोई नहीं होगा? मैं अभी कम से कम सत्तर बरस और जीने वाला हूँ🙂 तब तक तो देवनागरी और हिन्दी का प्रयोग करता रहूंगा। मै अकेला नहीं हूँ कम से कम ४०० हिन्दी चिठ्ठाकार और भी हैं, जो दिन रात देवनागरी और हिन्दी के प्रचार- प्रसार में अपना योगदान दे रहे हैं।
    बहुत उम्मीदों से आपके यहाँ आये थे😦
    जितना कष्ट पढ़ने से हुआ इससे कई गुना पढ़कर हुआ।

  4. हिंदी का साहित्य इतना समृध है की
    यह मर नहीं सकती…बंधु…भारत एक
    समेकित सांस्कृतिक राष्ट्र है अपितु हिंदी का कोमा
    में जाने का तो सबाल ही नहीं उठता…मात्र
    भाषागत विविधता के कारण इसे जितनी
    ऊँचाई मिलनी चाहिए थी वो नहीं मिल पाई,
    हिंदी ब्लागर से मेरा निवेदन है कि मात्र पत्रकारिता
    संदेश में हीं न उलझें,हिदी को समृध बनाने के लिए
    जरा साहित्यपरक विषयवस्तु को प्राथमिकता दें।
    इस समय हमारे सामने डा नाम्वर सिंह हैं लेकिन अगर
    ठीक से देखा जाए तो वे मात्र आलोचक दिखते हैं,साहित्य
    को उनकी देन कुछ भी नहीं है…या महावीर प्रसाद द्विवेदी भी
    इसी श्रेणी में आते हैं…॥

  5. वाक़ई आजकल रोमन में हिन्दी लिखने का चलन है और यह काफ़ी दु:खद भी है। इस बारे में मैं भी एक बार लिख चुका हूँ – रोमन लिपि के साथ हिन्दी का भविष्य

  6. चिंतन का विषय.

  7. Ek apraadhi hajir hai………..saath me hai, Safayi …..kah sakte hain,
    Ye huyi na baat, kauvon ko kaanv kaanv kar hi samjhaaya ja sakta hai. Hamari boli bhasha LIPI me hi ham samajh payenge.
    ANTARMAN ji devnagari ko lekar koi agrah nahi hai aur na hi koi heen bhavna hai, apke lekh ki bhasha me dasatva bhav.
    Hai to bas itna ki alaas, ki post karne me devnagari use kar leta hun ap tippadi karna itna avashyak ho jaata hai apke aur baki blog duniya ki posts padh kar ki kya karen control nahi hota ki, ruk kar devanagari me type karna tameej se seekh len. Aur saath me sonch ye ki itni bhi dikkat lage tippadi ki hai padhna lekhak ki majburi hai.
    Bas ek baat ant me ki “APKI” devnagari itni kshanbhangur bhi nahi, ki mere jaise “ANGREJI DASON” ke roman me likhane bhar se bas 10 saal hi jee paye.

  8. इस विषय पर इतनी तीखी और भावुक प्रतिक्रियाएं देख कर प्रसन्नता हुई। इस पोस्ट का आशय मीडिया से था, जो कि आप में से अधिकतर लोगों ने भाँप लिया। ज़ल्द ही अगली पोस्ट में उत्तर लिखूंगा!


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