होली के मौसम में मेरा चिट्ठा भी चोरी (?)

फ़रवरी 27, 2007 को 12:43 पूर्वाह्न | मौज़-मस्ती, समसामयिक में प्रकाशित किया गया | 10 टिप्पणियाँ

होली-पूर्व की ठिठोली का आगाज़ करते हुए हम नवोदित चिट्ठाकारा लावण्या जी से अनुरोध करते हैं कि इस समस्या का हल बताएँ! उन्होंने अपने चिट्ठे का नाम भी ‘अंतर्मन’ रखा है…जिससे कुछ समस्याएं पैदा हो सकती है, जैसे कि कोई मेरे चिट्ठे पर अपना गुस्सा उतारने के बजाए उनके चिट्ठे पर उतार सकता है…या उनकी चिट्ठी की तारीफ़ मेरे चिट्ठे में कर सकता है। वगैरह-वगैरह। बात सीरियस टाइप की है 😉 ।

आप सब से गुज़ारिश है कि इस बार होली पर मस्त-मस्त लेख-कविताएँ लिख मारें। अरे इससे अच्छा मौज़-मस्ती का मौक़ा कहां मिलेगा। और साल भर जिसके बारे में जो भी कहना हो- कह डालो….क्योंकि – बुरा न मानो…..होली है!

चिट्ठाकारों का होली-मिलन इस साल कहाँ आयोजित हो रहा है?

आप सबको होली-सप्ताह की शुभकामनाएं, खासकर हमारी चिट्ठा-भाभियों को! अरे गुझिया-पापड़ वगैरह तैयार किये कि नहीं? रंग और गुलाल की दूकान इधर है –

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रोमनागरी-२

फ़रवरी 10, 2007 को 5:04 अपराह्न | चिंतन, समसामयिक, समाज में प्रकाशित किया गया | टिप्पणी करे

(इस लेख में “लोगों” शब्द से मेरा तात्पर्य भारत की अधिकांश हिन्दी-भाषी जनता से है। मैं हिन्दी चिट्ठाकार-समूह की बात नहीं कर रहा, जिनके प्रयत्न से हिन्दी को नया आयाम मिला है और हिंदी का भविष्य और भी उज्ज्वल हुआ है| )

लोग परेशान हैं कि केकता कपूर टीवी धारावाहिकों के नामों की ‘स्पेलिंग’ को क्यों बिगाड़ रही है। जी हाँ, हिन्दी के शब्दों की रोमन वर्तनी की ग़लतियां लोगों को परेशान कर रही है। कितने लोगों को यह चिंता है..कि ये हिंदी के शब्द देवनागरी में क्यों नहीं लिखे जा रहे हैं। धीरे-धीरे जनसाधारण के मस्तिष्क मे‍ हिन्दी को रोमन में पढ़्ने व लिखने की आदत सी हो गई है।

हिन्दी फ़िल्मों में भी लोगों के नाम इत्यादि रोमन में ही दिखाए जाते हैं। विडम्बना यह है कि फ़िल्म के पैसे (अधिकतर) हिंदी-भाषी लोगों से वसूले जाते हैं, और हिंदी की अपनी लिपि से परहेज़ है। कुछ लोग कहेंगे कि हिंदी फ़िल्मों का दर्शक-वर्ग अन्य भाषाओं का भी होता है..और उनकी सुविधा के लिये ही रोमन में लिखा जाता है। परंतु समस्या यह है कि इस दर्शक वर्ग को हिंदी की अपनी लिपि से दूर क्यों रखा जा रहा है? अरे अधिक से अधिक देवनागरी के साथ रोमन में भी लिख दो। शायद कई अहिंदी-भाषी लोगों को ऐसा लगने लगा होगा कि हिंदी रोमन में ही लिखी जाती है।

कुछ दिनों पूर्व मेरी एक विदेशी नागरिक से बात हुई, जो कि मौक़ा लगने पर हिंदी फ़िल्में भी देखता है। उसको लग रहा था कि हिंदी की लिपि रोमन ही है। इस वार्तालाप के पश्चात मुझे बहुत ग्लानि हुई, और मुझको लगा कि हम रोमन में लिखकर लोगों को कितना ग़लत संदेश दे रहे हैं।

यदि आप क्षेत्रीय भाषाओं की फ़िल्मों अथवा टीवी चैनलों को देखेंगे तो पाएंगे कि इनमें अधिकतर अपनी लिपि का ही प्रयोग होता है। क्या इन फ़िल्मों या चैनलों को अन्य भाषा के लोग नहीं देखते?

हिंदी-फ़िल्मों के पोस्टर आपने कितनी बार हिंदी में लिखे देखें है?

हिंदी भाषी नगरों में अधिकतर नाम-पट्ट (घरों अथवा दूकानों) के सिर्फ़ अंग्रेज़ी में ही लिखे होते हैं, इसकी अपेक्षा क्षेत्रीय भाषाओं के नगरों में पिज़ा हट से लेकर डोमिनोज़ तक सब अपने नाम-पट्ट उन स्थानीय भाषा-लिपियों में भी लिखते हैं। मैं ग़लत हूं तो बताइये।

हिंदी तो किसी की भाषा ही नहीं रह गई है…यह सबकी हो गई है…और जिसका जैसा मन हो वह उस प्रकार उपयोग कर रहा है।

इट्स हाई टाइम वी गॉट सीरियस एबाउट दिस इश्यू!

रोमनागरी

जनवरी 18, 2007 को 10:13 अपराह्न | समसामयिक, समाज में प्रकाशित किया गया | 8 टिप्पणियाँ

Aajakal Indian that is Bharateeya media mein roman script mein hindi ke shabd dekhkar lagta hai ki log devanaagari ko nasht karane mein lage hain.Ham sasure bilaagar log bekar hee mein devanaagari mein likhane ke liye itanee mehanat mashakkat kar rahe hain!! Are aaj se 10 saal baad India mein devanaagari samajhane waala koi naheen milega…are jab devanaagari mein likha hi naheen jaa rahaa to seekhne-samajhane ki zaroorat hi kya hai.

 Hindi ko roman letters mein likhkar,  oopparr sse uskii spelling terhhi merhhi karr do to mazzaah hi alaggh hai!  Hindi mein program hai…hindi speaking darshak dekh rahe hain..hindi darshakon se paise liye jaa rahe hain…angrezee dikhane ke liye! Kassammh se!!

Are bhaai kyaa kamee hai apanee devanaagaree mein jo ki hamein roman ka sahara lena pad raha hai?
    Raajaneetik aur vaicharik daasata (slavery) apanaana bahut aasaan hai. Dekhiye mera ye lekh roman mein likhanaa kitna aasaan tha! Shaayad aapko padhane mein bhi zyaadaa asani hui hogi!!

देवनागरी देवों के लिये छोड़ दी है!  इंडिया के रोम-रोम में रोम रम गया है!

नव-वर्ष की नई तुकबंदी

जनवरी 7, 2007 को 12:54 अपराह्न | कविता, समसामयिक, हास्य-व्यंग्य में प्रकाशित किया गया | 13 टिप्पणियाँ

जब तक तुकबंदी करने पर कोई टैक्स नहीं लगता है…हम भी लिखते रहेंगे!

कुछ दिनों पहले जब मैं पुराने साल के धूल-जंग लगे दिये की साफ़-सफ़ाई कर रहा था तो उसमें से एक धुंधला-सा चेहरा दिखा….अचानक वो दिये से बाहर निकला और मुझसे बोला- “पहचान कौन?”। मैने अचकचाकर ज़वाब दिया..”याद नहीं आ रहा….?”। उसने अपना परिचय दिया – “मैं नये साल का जिन्न..अपनी नये साल की ख़्वाहिशें बता?” । खैर.. हमने तुरंत अपनी ‘न्यू इयर विशेज़’ की एक तुकबंदी की..और उसे सुना दी..अब यह आपके सामने पेश है:

हर इक चिट्ठे में पोस्ट रहे

बुश मिडिल ईस्ट का दोस्त रहे,

सबकी प्लेटों में टोस्ट रहे,

पार्टी में मुर्गा-रोस्ट रहे।

सलमानों पर शर्ट रहे

मलिकाओं पर स्कर्ट रहे

अपने-अपने धंधे में,

हर इक बंदा एक्स्पर्ट रहे।

चेहरों पर हर्ष विशेष रहे,

बढ़ता अपना विनिवेश रहे,

विकसित देशों की सूची में,

सर्वोपरि अपना देश रहे।

इन्सानों में मेल रहे,

इन्बाक्सों में ई-मेल रहे,

ओलंपिक खेलों की सूची में,

गुल्ली-डंडा भी खेल रहे ।

पूरी के संग भेल रहे,

पटरी पर हर इक रेल रहे,

गुंडों को तिहाड़ की जेल रहे,

कम्फ्यूटर वायरस फ़ेल रहे।

हर इक दीपक में तेल रहे,

दूकानों में सेल रहे,

असुरक्षित जीवों की श्रेणी से,

बाहर मानव और व्हेल रहे।

राष्ट्रों में विचार-विमर्श रहे,

हर दिन अपना नव-वर्ष रहे,

हम सब भक्तों के मस्तक पर,

ईश्वर-कर का स्पर्श रहे।

नव-वर्ष : एक कविता

दिसम्बर 31, 2006 को 1:30 पूर्वाह्न | कविता, समसामयिक में प्रकाशित किया गया | 3 टिप्पणियाँ

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नए वर्ष का कर अभिनंदन,

हम अपनी नौका को लेकर –

चलें नए पानी में खेने,

भू्लें विगत वर्ष का क्रंदन ।

 इस वसुधा का ध्यान रखेंगे,

देश-धर्म का मान करेंगे,

चहुंदिशि शांति रहेगी एवं –

प्रतिपल मानवता का वंदन। 

हर हाला हम पी जाएंगे,

हर एक पल हम जी जाएंगे,

हार नहीं मानेंगे फिर भी,

समय सर्प है – हम हैं चंदन।

नए साल के ‘रिज़ाल्यूशन्स’

दिसम्बर 31, 2006 को 1:20 पूर्वाह्न | मनोरंजन, समसामयिक, हास्य-व्यंग्य में प्रकाशित किया गया | 7 टिप्पणियाँ

चूंकि आप अपने ‘रिज़ाल्यूशंस’ की लिस्ट बना ही रहे हैं तो मैंने आपकी सहायता के लिये नीचे एक सूची दी है, जो कि आप (हर साल) उपयोग में ला सकते हैं –

१. ब्लागिंग बन्द!

२. रोज़ ‘जिम’ (व्यायाम-कक्ष) / ‘योगा’ या सुबह की सैर के लिये जाना

३. ‘डाइट’ पर ‘कंट्रोल’ करना – मिठाइयाँ और ‘जंक फ़ूड’ इत्यादि कम!

४.  कार्य-स्थल (ऑफ़िस) में अपने काम पर ज़्यादा ‘फ़ोकस’ और ‘वाटर-कूलर डिस्कशन्स’ पर कम :-)!

५. नए साल में सारे ‘बिलों’ का समय पर भुगतान

६.  नए साल में सारी ई-मेल्स का समय पर ज़वाब

७. नए साल में एक नए शगल/’हॉबी’/विधा/खेल में मास्टरी

८. अगले साल ‘नो प्रोक्रैस्टिनेशन’ याने आज का काम कल पर टालना बंद

९. (नोट: इस ‘रिज़ाल्यूशन’ के बारे में कल सोचता हूँ)

१०. अगले साल के लिये ‘रिज़ाल्यूशंस’ बनाना (देखें – उपरोक्त बिन्दु १ से ९)

नए वर्ष – बीते पल

दिसम्बर 31, 2006 को 12:40 पूर्वाह्न | मौज़-मस्ती, समसामयिक में प्रकाशित किया गया | 4 टिप्पणियाँ

नव वर्ष के लिये आप सबको हार्दिक मंगलकामनाएं!

सोच रहा था कि क्या लिखूं, तभी सोचा कि मैंने अपने पिछले दस सालों में लोगों को ‘हैप्पी न्यू इयर’  किन-किन शहरों में बोले हैं, और  कैसे – तो यह रही एक संक्षिप्त झलक:

१. १९९७ – लखनऊ (नई नौकरी शुरू करने के पहले घर पर छुट्टियाँ, शायद हमेशा की तरह दूरदर्शन पर बीते वर्ष की झलकियां या नव वर्ष का ‘स्पेशल’ प्रोग्राम देखा )

२. १९९८ – पूना (अमेरिका स्थानांतरण के पहले की तैयारियाँ, शायद किसी रेस्टोरेंट में दोस्तों के साथ)

३. १९९९ – लखनऊ ( घर पर छुट्टियाँ, अमेरिका यात्रा की तैयारियाँ)

४. २००० – सैन फ़्रान्सिस्को ( मौज – मस्ती, ‘वाई -२के बग’ और नई सदी का स्वागत, एस. एफ़.  शहर का ज़श्न दोस्तों के साथ)

५. २००१ – लास वेगास  ( मौज – मस्ती *2, २००० का क्रिसमस भी यहीं ‘मनाया’ था, ५ दिन बाद फ़िर वापस आया! यह मेरा अभी तक देखा हुआ सबसे रोमांचक नव वर्ष स्वागत समारोह है)

६,७,८,९ : २००२,२००३, २००४, २००५ – (बैंगलोर/दक्षिण भारत के किसी क्लब/रेज़ार्ट या रेस्टोरेंट्स में परिवार के साथ समय बिताया)

८. २००६ – न्यू जर्सी (अमेरिका, घर में बैठकर परिवार के साथ टीवी पर टाइम्स स्क्वायर का नववर्ष समारोह देखा)

 आशा है आप भी अपने पिछले नव वर्षों के बारे में संक्षेप/विस्तार से बताएंगे, कुछ नहीं तो ऐसी ही एक छोटी सी लिस्ट ही सही!

इस हफ़्ते

जुलाई 15, 2006 को 12:53 पूर्वाह्न | चिंतन, समसामयिक में प्रकाशित किया गया | टिप्पणी करे

इस सप्ताह मुम्बई विस्फोट के समाचार ने बहुत दुखी कर दिया…आखिर कब खत्म होगा ये सब?२००-२५० लोग…क्या कम हैं? भारत कीम ज़बूरियां क्या है?? दो सैनिकों का अपहरण हुआ और इज़्रायल ने हिज़्बोल्ला पर चढ़ाई कर दी। जाने कहां थमेगा ये सब! यहां अमरीका मे‍ तो सुबह शाम इरान, ईराक, इस्रायल, सीरिया सुनाई देता है समाचारो‍ मे‍ हर मिनट!

“विस्फोट पाकिस्तान ने करवाया है”…अरे रोको उसे!!

लेबनान की सरकार कह रही थी कि हिज़बुल्ला उसके कन्ट्रोल मे‍ नही‍ है…तो इसरायल ने बोला ..तुम नही‍ कर सकते तो हम कर देते है‍।  हालांकि पाकिस्तान के परमाणविक देश होने के कारण समीकरण यहां अलग है…पर फ़िर भी…कुछ करना पड़ेगा भाई!

मुझे लग रहा है कि इन पागलो‍ का अगला निशाना बैंगलोर है।

खैर..आजकल व्यस्तताओ‍ के चलते चिट्ठा लेखन-पठन सामान्यतया सप्ताहान्त पर ही कर पाऊंगा…आशा है आपका सहयोग यथावत बना रहेगा…और यदि आपके चिट्ठे पर मेरी टिप्पणी एक हफ़्ते बाद आती है तो वजह समझ जाइयेगा…यहां पर आते रहिये!

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