हवाई यात्रा अनुभव- भाग १

फ़रवरी 11, 2007 को 1:12 पूर्वाह्न | यात्रा, यादें, विदेश, हास्य-व्यंग्य में प्रकाशित किया गया | 1 टिप्पणी

(कुछ दिनों पूर्व मैंने अपनी हवाई यात्राओं के किस्से लिखने का प्रयत्न किया था…पर समयाभाव के कारण सिर्फ़ सूची ही प्रस्तुत कर सका था- प्रस्तुत है, एक यात्रा-अनुभव का विवरण। मैं हर लेख को एक बार में पूरा लिखने का प्रयत्न करूंगा, पर हो सकता है कि हर लेख कई भागों में लिखना पड़े। आशा है- साथ देंगे)

मैंने ऐसी किसी हवाई – यहां तक कि रेल-यात्रा की भी कल्पना नहीं की थी।

हुआ कुछ यूं कि अमरीका से अपने गृह नगर लखनऊ जाने के लिये हर बार दिल्ली से लखनऊ के लिये जेट एयर्वेज़ की फ़्लाइट लेता था, परंतु इस बार जेट एयर्वे़ज़ में सीट नहीं मिली। इंडियन एयर्लाइन्स के नाम से मुझे इतना परहेज़ होता था कि मैं जेट में सीट न मिलने पर अपनी यात्रा की तारीख तक बदल देता था! पर इस बार काम कुछ अर्जेन्ट सा था, तो ऊपर वाले का नाम लेकर इं.ए. का टिकट ले लिया।

खैर…ज़नाब रात को विमान से नीचे देखा तो पाया के धरती पर जो शहर दिख रहा है..उसकी लाइटें बेतरतीब आकार बना रही हैं । मुझे समझ में आ गया कि दिल्ली आने वाला है..और चेहरे पर भारत पहुंचने की मुस्कान आ गई। नीचे उतरते ही आगमन-कक्ष की बुरी हालत से अवगत हुआ…और सारी खुशी गायब हो गयी…सच मानिये भारतीय इमिग्रेशन कक्ष की इतनी बुरी हालत थी जितनी कि एक भारतीय सरकारी दफ़्तर में भी मैंने नहीं देखी थी। मैंने सोचा कि भारत की राजधानी आने वाले लोग जहाज़ से उतरते ही सबसे पहले जिस जगह पहुंचते हैं…वही जगह इतनी गंदी है…लोगों को कितना बुरा आइडिया लगेगा अपने देश की हालत के बारे में। लाइन में खड़े-खड़े मैंने आस-पास के विदेशियों से नज़रें चुराने शुरु कर दीं, खासकर उस अमरीकी व्यक्ति से…जिससे मैंने रास्ते भर भारत के विकास के बारे में तारीफ़ की थी।

खैर मेरा नम्बर आया तो सामने के अधिकारी महोदय ने मुझको ऐसे देखा कि जैसे मैं ही उनकी इस रात की ड्यूटी का कारण हूं। उनके मुख मंडल से गायब मुस्कान उस कमरे की एक प्लास्टर-रहित दीवाल के साथ मैच कर रही थी। लगता था, कि वो बोलने का ओवर्टाइम लेते हैं, सिर्फ़ हाथ आगे बढ़ा दिया। मैंने सारे कागज़ात आगे कर दिये तो वो बोले – “सिर्फ़ पास्पोर्ट” । अरे यार पहले बोल देना था कि सारे कागज़ नहीं चाहिए। थोड़ा और आगे बोले तो बताय कि फ़लां अमरीकी शहर में उनके एक दोस्त के रिश्तेदार रहते हैं। जैसे मुझे इस इन्फ़ार्मेशन की बहुत आवश्यकता थी। खैर …इनसे सुरक्षित बचा तो सामान वगैरह लेकर डोमेस्टिक टर्मिनल पहुंचा। वहां पर पूरी रात गुज़ारनी थी । यहां सुबह की पटना फ़्लाइट का इंतज़ार करते हुए एक सज्जन मिले जो कनाडा से आए थे।

(क्रमशः)

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नव-वर्ष की नई तुकबंदी

जनवरी 7, 2007 को 12:54 अपराह्न | कविता, समसामयिक, हास्य-व्यंग्य में प्रकाशित किया गया | 13 टिप्पणियाँ

जब तक तुकबंदी करने पर कोई टैक्स नहीं लगता है…हम भी लिखते रहेंगे!

कुछ दिनों पहले जब मैं पुराने साल के धूल-जंग लगे दिये की साफ़-सफ़ाई कर रहा था तो उसमें से एक धुंधला-सा चेहरा दिखा….अचानक वो दिये से बाहर निकला और मुझसे बोला- “पहचान कौन?”। मैने अचकचाकर ज़वाब दिया..”याद नहीं आ रहा….?”। उसने अपना परिचय दिया – “मैं नये साल का जिन्न..अपनी नये साल की ख़्वाहिशें बता?” । खैर.. हमने तुरंत अपनी ‘न्यू इयर विशेज़’ की एक तुकबंदी की..और उसे सुना दी..अब यह आपके सामने पेश है:

हर इक चिट्ठे में पोस्ट रहे

बुश मिडिल ईस्ट का दोस्त रहे,

सबकी प्लेटों में टोस्ट रहे,

पार्टी में मुर्गा-रोस्ट रहे।

सलमानों पर शर्ट रहे

मलिकाओं पर स्कर्ट रहे

अपने-अपने धंधे में,

हर इक बंदा एक्स्पर्ट रहे।

चेहरों पर हर्ष विशेष रहे,

बढ़ता अपना विनिवेश रहे,

विकसित देशों की सूची में,

सर्वोपरि अपना देश रहे।

इन्सानों में मेल रहे,

इन्बाक्सों में ई-मेल रहे,

ओलंपिक खेलों की सूची में,

गुल्ली-डंडा भी खेल रहे ।

पूरी के संग भेल रहे,

पटरी पर हर इक रेल रहे,

गुंडों को तिहाड़ की जेल रहे,

कम्फ्यूटर वायरस फ़ेल रहे।

हर इक दीपक में तेल रहे,

दूकानों में सेल रहे,

असुरक्षित जीवों की श्रेणी से,

बाहर मानव और व्हेल रहे।

राष्ट्रों में विचार-विमर्श रहे,

हर दिन अपना नव-वर्ष रहे,

हम सब भक्तों के मस्तक पर,

ईश्वर-कर का स्पर्श रहे।

नए साल के ‘रिज़ाल्यूशन्स’

दिसम्बर 31, 2006 को 1:20 पूर्वाह्न | मनोरंजन, समसामयिक, हास्य-व्यंग्य में प्रकाशित किया गया | 7 टिप्पणियाँ

चूंकि आप अपने ‘रिज़ाल्यूशंस’ की लिस्ट बना ही रहे हैं तो मैंने आपकी सहायता के लिये नीचे एक सूची दी है, जो कि आप (हर साल) उपयोग में ला सकते हैं –

१. ब्लागिंग बन्द!

२. रोज़ ‘जिम’ (व्यायाम-कक्ष) / ‘योगा’ या सुबह की सैर के लिये जाना

३. ‘डाइट’ पर ‘कंट्रोल’ करना – मिठाइयाँ और ‘जंक फ़ूड’ इत्यादि कम!

४.  कार्य-स्थल (ऑफ़िस) में अपने काम पर ज़्यादा ‘फ़ोकस’ और ‘वाटर-कूलर डिस्कशन्स’ पर कम :-)!

५. नए साल में सारे ‘बिलों’ का समय पर भुगतान

६.  नए साल में सारी ई-मेल्स का समय पर ज़वाब

७. नए साल में एक नए शगल/’हॉबी’/विधा/खेल में मास्टरी

८. अगले साल ‘नो प्रोक्रैस्टिनेशन’ याने आज का काम कल पर टालना बंद

९. (नोट: इस ‘रिज़ाल्यूशन’ के बारे में कल सोचता हूँ)

१०. अगले साल के लिये ‘रिज़ाल्यूशंस’ बनाना (देखें – उपरोक्त बिन्दु १ से ९)

चिट्ठा-शेर

जुलाई 17, 2006 को 9:59 अपराह्न | हास्य-व्यंग्य में प्रकाशित किया गया | 5 टिप्पणियाँ

मुलाहिज़ा फ़रमाइये-

उनकी हर लाइन पर दस कमेन्ट आते है‍-

हम रात भर लिखते हैं तो चर्चा नहीं होता!

🙂

हिन्दी में ब्लॉग-लेखन के फायदे :

अप्रैल 24, 2006 को 12:05 पूर्वाह्न | हास्य-व्यंग्य में प्रकाशित किया गया | टिप्पणी करे

मेरे हिसाब से हिन्दी में ब्लॉग-लेखन के यह फायदे है:

  1. बहुत कम सम्भावना है कि आपका बॉस हिन्दी में 'गूगल' करके आपके ब्लॉग तक पहुँच जाएगा! 🙂
  2. 'इंडिया' वालों को लगेगा कि अनिवासी भारतीयों को अपनी भाषा पर इतना गर्व और प्रेम है, तो शायद उन्हें भी कुछ प्रेरणा मिलेगी।
  3. आप 'भेड़चाल' से बाहर रहकर अपनी भाषा, अपने शब्दों में अपने विचार रखेंगे, जो कि एक 'टार्गेटेड ऑडिएंस' तक पहुंचेगी – गूगल के 'ऐडवर्ड्स' की तरह|
  4. आपके 'फेमस' होने और/अथवा ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने की सम्भावना अधिक बढ़ जाती है (अंग्रेज़ी की अपेक्षा।
  5. हिन्दी का प्रचार-प्रसार और सेवा करने का मौक़ा मिलता है – एक तीर से दो शिकार की तरह!
  6. भाभीजी यह ब्लॉग कम (या नहीं) देखेंगी , और आपके द्वारा लिखे गये भूतपूर्व (या करेंट) प्रेम-प्रसंगों पर उनकी नज़र जाने की सम्भावना कम हो जाती है। उनके टिप्पणी करने की सम्भावना और भी कम हो जाती है (हिन्दी टंकण और भी कठिन है)।

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