आवश्यक सूचना…ब्लॉगर पर वापसी!!

अगस्त 6, 2007 को 10:18 अपराह्न | Uncategorized में प्रकाशित किया गया | 6 टिप्पणियाँ

मैँ पुनः ब्लॉगर.कॉम पर वापस चला गया हूँ…आगे से वहीँ मुलाक़ात होगी! पता है: http://antarman.blogspot.com . मेरे चिट्ठा-लेखन की शुरुआत इसी चिट्ठे से हुई थी….पिछले वर्ष वर्ड्प्रेस पर वापस आया…और अब ब्लॉगर पर वापस जा रहा हूँ।

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हिन्दी एक क्षेत्रीय भाषा?

जुलाई 29, 2007 को 12:57 पूर्वाह्न | Uncategorized में प्रकाशित किया गया | 2 टिप्पणियाँ

http://in.msn.com के अनुसार हिन्दी एक ’क्षेत्रीय भाषा’ है।

पारसी एवं हिन्दू धरम – जतीन्द्र मोहन की पुस्तक

अप्रैल 9, 2007 को 10:09 अपराह्न | Uncategorized में प्रकाशित किया गया | 1 टिप्पणी

जतीन्द्र मोहन चटर्जी की इस पुस्तक (http://www.avesta.org/chatterj_opf_files/slideshow.htm)  को पढ़ कर देखिये। इसके प्रिफ़ेस में काफ़ी रोचक जानकारी है – बाकी पुस्तक में पारसियों की धर्म-पुस्तक ’गाथा’ का अनुवाद किया गया है।

चटर्जी साहब के अनुसार :

१. वेदों में वर्णित ’वरुण’ जो कि असुरों के देव हैं,  पारस ’सुर’ शब्द भारत के वासियों के लिये प्रयुक्त होता था। सुर के देव ’इन्द्र’ थे…जो कि  वरुण के मित्र थे। (वरुण-इन्द्र की एक साथ उपासना होती थी)। इन्द्र देव पारसी धर्म में ’मित्र’ के रूप में जाने जाते थे। ’असुर’शब्दशुरुआत में एक आदरणीय शब्द था जो कालांतर में ’दानव’ के लिये प्र्युक्त होने लगा।

२. ’अहुरा माज़्दा’ जो कि पारसीयों के ईश्वर हैं – वेदों में ’हरि मेधा’ के नाम से जाने जाते हैं।

३. वेदों में     वर्णित परशुुराम सम्भवतः पारसी महारथी थे।

४. पारसी (असुर) मूर्ति-पूज के विरुद्ध थे एवम ’सुर’ मूर्ति-पूजक थे।  देवासुर संग्राम ् इन्ही दोनों के बीच का ्युद्ध है।

इसके अलावा इस पुस्तक में अन्य बहुत सी बातें लिखी हैं। आप ही अपने विचार बताएं।

हमारा इतिहास: भाषाएँ/लिपियों में समानताएँ

अप्रैल 7, 2007 को 3:22 पूर्वाह्न | Uncategorized में प्रकाशित किया गया | 6 टिप्पणियाँ

भाषा-लिपियों में मुझे बचपन से दिलचस्पी है। बचपन में मैंने थोड़ी बहुत बंगाली, तमिल, गुरमुखी, उड़िया, उर्दू (फ़ारसी) इत्यादि लिपियां सीखी थीं।

कुछ दिनों पूर्व अन्तरजाल पर पुरातन लिपियों के बारे में पढते हुए कुछ रोचक जानकारियां सामने आईं। यह विचार सामने आया कि क्या हमारे वैदिक/संस्कृत काल के महापुरुषों का फ़ारसी/ग्रीको-रोमन लोगों से कुछ लेना देना है? मायने यह कि लगता है कि हमारे पूर्वज कहीं इन देशों से तो नहीं थे, या कहीं इन देशों के ऐतिहासिक पुरुष भारत से तो नहीं थे? कुछ बेतरतीब विचार प्रस्तुत हैं,  फ़ुरसत मिलने पर इन्हें संयोजित करूंगा। अधिकतर जानकारी www.ancientscripts.com से साभार।

१. “ओल्ड पर्सियन”  में राजा के लिये ‘क्षत्रिय’ से मिलता जुलता एक शब्द प्रयुक्त होता था।

२. “भूमि” के लिये भी “भूमि” ,  भगवान के लिये “बग”, देश के लिये “दह्यौस” शब्द काफ़ी समान हैं। अन्य समानताएँ: http://en.wikipedia.org/wiki/Proto-Indo-Iranian

३. ‘कुरु’ कहीं ‘साइरस’ तो नहीं था (ओल्ड पर्सियन में Kūruš) (http://en.wikipedia.org/wiki/Kuru_%28kingdom%29)

४.  ‘अवेस्तन’ भाषा से संस्कृत की इतनी समानता क्यों? (http://en.wikipedia.org/wiki/Template:Iranian_Languages, लिपियों में समानता: देखें ‘अ’ ,’आ’, ‘इ’, ‘ओ’ , ट, ठ, ढ, म  http://www.ancientscripts.com/avestan.html)। यहाँ अन्तिम पैरा पढ़ें”

The ə symbol represents the mid central vowel (schwa) like the “e”s in “taken”.

    təm amavantəm yazatəm
    tam amavantam yajatam
     
    surəm damohu scvistəm
    suram dhamasu savistham
     
    miθrəm yazai zaoθrabyo
    mitram yajai hotrabhyah

५.  ओल्ड पर्सियन और देवनागरी वर्णमाला में काफ़ी समानताएं हैं। (http://www.ancientscripts.com/oldpersian.html)

६. देखें: http://www.avesta.org/chatterj_opf_files/slideshow.htm

७. कोरियन एवं देवनागरी में समानता: http://www.ancientscripts.com/korean.html. देखे: ट, र, म, प

८. ब्राह्मी लिपि एवन खरोष्ठी लिपि के काफ़ी अक्षर मध्य-पूर्वी लिपियों से मिलते हैं।

९. और तो और…कुछ जापानी अक्षर भी देवनागरी से मिलते-जुलते हैं।

आप इस बारे में अपने विचार भी मुझे बताएं। मैं आगे भी इस विषय पर जानकारी देता रहूंगा।

होली कविता

मार्च 6, 2007 को 8:19 अपराह्न | Uncategorized में प्रकाशित किया गया | 8 टिप्पणियाँ

[यह कविता कुछ दिनों पहले लिखी थी, पर समयाभाव की वजह से पोस्ट नहीं कर पाया। शायद आपको पसंद आए।] 

हो मंगलमय सबकी होली।

जिसने-जिसने पहने थे
भीगे उसके लहँगा-चोली।

जीजाजी रँग हैं लगा रहे,
साली उनकी कितनी भोली।

सब नाच रहे भँगडा-पा कर
रँग लाई भंग की इक गोली।

लेकर पिचकारी-गुब्बारे,
निकली होलिहारों की टोली।

पान बनारस का खाके,
ठंडाई मेँ मिसरी घोली ।

गम अपने-अपने भूले जब,
मिल गए गले सब हमजोली ।

घुल गये होली के  रंगों में,
सब छाप-तिलक-चन्दन-रोली।

कोई कैसे चुपचाप रहे,
कोलाहल की तूती बोली

सुमधुर स्वर दसों-दिशाओं  में,
बागोँ मेँ कोयल है डोली।

शरमाए-से सूरज ने भी
किरणों की गठरी खोली।

हो मंगलमय सबकी होली।

-‘अन्तर्मन’

चिट्ठे जो लिखे नहीं गए…

मार्च 1, 2007 को 12:45 पूर्वाह्न | Uncategorized में प्रकाशित किया गया | 10 टिप्पणियाँ

(बुरा न मानो…:-)

(नोट: उपर्युक्त वाक्य फ़िर से पढ़ें )

हमें इन चिट्ठों का इन्तज़ार है…और रहेगा!

फ़ुरसतिया: गागर में सागर

जीतू: संज़ीदा लेखन के नए आयाम

अतुल: अविरत चिट्ठा लेखन के १०१ फ़ायदे

ईस्वामी: अन्कंट्रोवर्शियल ब्लॉग लेखन कैसे संभव

रवि रतलामी:  अव्यावसायिक चिट्ठा लेखन की समसामयिकता

समीर भाई:  गिरते बालों को फ़िरसे कैसे उगाएँ

आशीष:  कन्याओं से मित्रता  बढ़ाने के गुर

(होली की बधाइयाँ…)

अमेरिकन आइडल २००७ – एक भारतीय मूल का युवक?

फ़रवरी 20, 2007 को 10:39 अपराह्न | Uncategorized में प्रकाशित किया गया | 6 टिप्पणियाँ

आज के अमेरिकन आइडल (चैनल फ़ाक्स ५ : ८-१०) में एक १७ वर्षीय भारतीय मूल का  युवक – संजय भी मैदान में है…मेरे हिसाब से अमेरिकन आइडल में इतनी दूर तक पहुंचने वाला यह पहला भारतीय मूल का युवक है। आशा है सारे भारतीय इस्को वोट देंगे – आज उसने कुछ खास नहीं गाया, पर यदि आप आज (२० फ़रवरी) १० बजे से ११ बजे ई एस टी में उसे वोट कर सकें तो अच्छा होगा। वोटिंग का नम्बर है: १-८६६-IDOLS-०८.

हालिडे शापिंग – पैसे कैसे बचाएँ

दिसम्बर 17, 2006 को 1:43 पूर्वाह्न | Uncategorized में प्रकाशित किया गया | 4 टिप्पणियाँ
  1. पैसे खर्च न करें
  2. यदि #1 संभव न हो तो नं ३ से 10 तक आज़माएं
  3. सभी बड़े स्टोर्स और निर्माताओं की वेबसाइट पर जाकर उनकी ई-मेल मेलिंग लिस्ट में सब्स्क्राइब करें। मेरा अनुभव है कि आजकल ई-मेल मार्केटिंग में अधिक डील्स/कूपन्स मिल रहे हैं।
  4. ‘डील्स’ की वेब्साइटों’ पर नज़र रखें (slickdeals.net, edealinfo.com, deals2buy.com इत्यादि)। इनकी आर एस एस फ़ीड्स सब्स्क्राइब कर लें।
  5. रविवारीय अख़बार में आने वाले कूपनों को प्रयोग करने की आदत डालें। याद रखें के कुछ स्टोर मैन्युफ़ैक्चर कूपनों को २ य ३ गुना भी करते हैं (सावधान रहें कहीं वस्तु की कीमत बढ़ा तो नहीं दी गई है)
  6. बड़े स्टोर्स में सप्ताहन्तों के बजाय वीकडेज़ में जो सेल लगती है, उसमें अक़्सर भाव बहुत कम रहतें हैं।
  7. यह कहा जाता है कि २४ दिसम्बर की शाम को वस्तुओं केभाव सबसे अधिक रहते हैं – अपनी गिफ़्ट शापिंग इससे पहले खत्म कर लें।
  8. २६ दिसंबरकी सेल पर नज़र रखिये। इस दिन चीज़ों के दाम बहुत गिरने की सम्भावना है – बहुत से लोग अगले वर्ष के लिये इस दिन वस्तुएं खरीद लेते हैं।
  9. सम्भव हो सके तो अपनी ‘विश लिस्ट’ बना लें और लिख लें कि आपका ‘टार्गेट प्राइस (उचित मूल्य) क्या है।
  10. आप इस बारे में अपने विचार हमें बताएं।

आज का विचार

दिसम्बर 17, 2006 को 1:03 पूर्वाह्न | Uncategorized में प्रकाशित किया गया | 2 टिप्पणियाँ

“यदि हममें (प्रयत्न करने के बाद) थोड़ी सी भी ऊर्जा बाक़ी है – तो इसका मतलब है कि हमने अपने कार्य को ठीक ढंग से नहीं किया”

– रोले़क्स घड़ी के एक विज्ञापन से

वापसी

दिसम्बर 9, 2006 को 1:05 पूर्वाह्न | Uncategorized में प्रकाशित किया गया | 3 टिप्पणियाँ

बहुत दिनों बाद कुछ लिखने का प्रयत्न कर  रहा हूँ। वैयक्तिक कारणोंवश कुछ सोचने-लिखने का मौक़ा ही नहीं मिल रहा था।  यह वर्ष ऐसा बीता कि जिसके बारे में लिखने के लिये शब्द ही पर्याप्त नहीं…

आज इस वर्ष का पहला हल्का-फ़ुल्का हिमपात हुआ( स्नो-फ़्लरीज़) । यह देखकर याद आया कि मैंने अपने चिट्ठे पर पिछले वर्ष  हिमपात के कुछ चित्र डाले थे…इसी से याद आया कि बहुत दिनों से मैंने आप लोगों से बात नहीं की…याने इस चिट्ठे पर कुछ लिखा नहीं।

मैं जिस अनुवादक साफ़्ट्वेयर के बारे में ज़िक्र कर रहा था…आज मैने उस पर बहुत दिनों बाद फिर से कुछ काम किया…अभी मैंने डाटाबेस डिज़ाइन में थोड़ा परिवर्तन किया है, और इस प्रोग्राम को डेस्क्टाप से वेब बेस्ड बना दिया है…वैसे काम अभी शैशवावस्था में है, फ़िर भी यदि किसी को कोई प्रश्न को तो टिप्पणी ज़रूर करें।

आज बहुत दिनों बाद जीतू और फ़ुरसतिया के कुछ लेख  पढ़, और बहुत आनन्द आया….! हिन्दी चिट्ठाकारी में अनगिनत नए लेखक देखकर भी बहुत खुशी हुई।

यहाँ पर क्रिस्मस की खरीदारी अपनी चरम सीमा पर है..अखबार ,टीवी वगैरह ‘सेल’ से रंग मे‍ सराबोर हो गये हैं! मज़े की बात यह है के हर रोज़ सेल होती है और लिखा होता है ‘वन डे’ आन्ली! वैसे ‘धन्यवाद दिवस’ के बाद वाले ‘काले शुक्रवार’  पर काफ़ी काम के सामान काफ़ी सस्ते मिल रहे थे।

ज़ल्द ही आगे  लिखने का प्रयत्न करता हूं। नमस्कार!

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